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IVF तकनीक क्या है? और यह क्यों फेल हो जाती है?

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IVF तकनीक क्या है? और यह क्यों फेल हो जाती है?

IVF तकनीक क्या है?

 

IVF तकनीक ऐसे लोगों के लिए एक वरदान है जो माता या पिता बनने की क्षमता नहीं रखते हैं। इस तकनीक के तहत आज के समय में दुनिया के कई ऐसे लोग हैं जिनकी कोख में बच्चा है। इस फर्टिलिटी तकनीक के तहत सबसे पहले पुरुष के स्पर्म और महिला के एग को बाहर निकाला जाता है और फिर उन्हें फर्टिलाइज किया जाता है।  महिला के शरीर के बाहर होने वाली ये प्रक्रिया लैब के अंदर की जाती है। ये फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया लैब के अंदर एक ग्लास पेट्री डिश में की जाती है। इस प्रक्रिया के बाद बने एम्ब्र्यो यानी भ्रूण को माता के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है ताकि वह विकसित होकर शिशु का आकार ले सके।

 

क्यों फेल हो जाती है IVF तकनीक?

 

वेल्स के अनुसार IVF तकनीक से तैयार भ्रूण में से सिर्फ ३०% ही गर्भधारण की गारण्टी देते हैं। नया टेस्ट इन्हीं भ्रूण के चयन में मदद करेगा। उन्होंने बताया कि चिकित्सा जगत के पास भ्रूण की जांच के अन्य तरीके भी उपलब्ध हैं। लेकिन काफी महंगा और जटिल होने के कारण इन्हें ज्यादा उम्र और बार-बार गर्भपात का सामना करने वाली महिलाओं पर ही आजमाया जाता है। वेल्स ने कहा, नए परिक्षण का खर्च मौजूदा तकनीक से दो-तिहाई कम होगा। इससे संतान सुख के लिए IVF का सहारा लेने वाले लगभग सभी जोड़ों को परिक्षण की पेशकश करने की राह खुलेगी।

 

चालीस साल पहले जब दुनिया में पहला परखनली शिशु पैदा हुआ था, तो निस्संतान जोड़ों में आशा की किरण जगी थी कि अब संतान सुख के लिए निराश होने की जरूरत नहीं है। मगर, आए दिन कई दंपतियों को बार-बार इन व्रिटो फर्टिलाइजेशन यानी IVF करवाने के बावजूद विफलता हाथ लगने की शिकायतें रहती हैं। इसलिए यह जानना काफी जरूरी है कि आखिर इसकी क्या कारण होती हैं। IVF एक ऐसी तकनीक है जिसमें किसी दंपति से अंडाणु और शुक्राणु लेकर उसके बीच निषेचन की क्रिया परखनली में यानी ट्यूब में करवाया जाता है, इसके बाद भ्रूण महिला के गर्भाशय में रोपित किया जाता है।

 

नोवा इवी फर्टिलिटी के दिल्ली में लाजपत नगर स्थित क्लिनिक की कंसल्टेंट डॉ. पारुल कटियार बताती हैं, 'कि IVF की विफलता के कारणों की पहचान कर उसका उपचार करने पर IVF की सफलता की संभावना ज्यादा रहती है। डॉ पारुल ने कहा कि आज करियर संवारने की ख्वाहिश रखने वाले युवा शादी करने या बच्चे पैदा करने में अक्सर देर कर देते हैं, जबकि उम्र बढ़ने से पुरुष और महिलाओं दोनों के साथ संतानोत्पति को लेकर समस्या पैदा होती है। उन्होंने बताया कि 35 साल के बाद महिलाओं में अंडाणु बनने की क्षमता कम होने लगती है। इसी प्रकार पुरुषों में शुक्राणुओं की गुणवत्ता भी IVF की सफलता के लिए अहम होती है। उन्होंने बताया कि शुक्राणुओं में डीएनए फ्रेगमेंटेशन के भी मामले देखने को मिलते हैं जो भ्रूण में आनुवंशिक असामान्यताएं पैदा करते हैं और इसके चलते IVF विफल हो जाते हैं।

 

गर्भाशय की समस्याओं और भ्रूण की गुणवत्ता में कमी के कारण भी IVF विफल हो जाता है। उन्होंने कहा कि आज IVF के पर्सनलाइज्ड प्रोटोकॉल्स की जरूरत बढ़ गई है। इनमें पर्सनलाइज्ड एंब्रायो ट्रांसफा-पीईटी- और पर्सनलाइज्ड ओवेरियन स्टिम्युलेशन प्रमुख हैं। विशेषज्ञ ने कहा कि एसिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलोजी-एआरटी- से निस्संतान जोड़ों को विकल्प तलाशने में मदद मिली है।

 

ब्लास्टोसिस्ट कल्चर, मैग्नेटिक एक्टिवेटेड सेल सॉर्टिग्स-एसएसीएस-जैसी तकनीकों और प्री-प्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग-पीजीएस- प्री-प्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस-पीजीडी और एंडोमेट्रियल रिसेप्टिव अरे-ईआरए जैसे रिपड्रक्टिव जेनेटिक्स से IVF की सफलता की दर काफी बढ़ जाती है। डॉ. पारुल ने एक IVF की सफलता की दरें 25-35 वर्ष की महिलाओं में ज्यादा होती हैं। उन्होंने कहा कि 20-25 वर्ष की उम्र युवतियों में संतानोत्पति के लिए सबसे उपयुक्त होती है।

 

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