एक मैराथन ने सिर्फ़ डिलीवरी के बाद मेरा वज़न कम नहीं किया, बल्कि फ़िटनेस को लेकर मेरा नजरिया बदल दिया

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एक मैराथन ने सिर्फ़ डिलीवरी के बाद मेरा वज़न कम नहीं किया, बल्कि फ़िटनेस को लेकर मेरा नजरिया बदल दिया

'तेरा वज़न बढ़ जाएगा', 'इतनी आसानी से कम नहीं होगा'... ये प्यारे वचन थे मेरी उन चाचियों और बहनों के, जो माँ बनने का सुख-दुःख भोग चुकी थी. मैं शुरू से ही काफ़ी एक्टिव रही हूँ इसलिए अपने प्रेगनेंसी के दौरान वज़न बढ़ने के ख्याल ने मुझे परेशान नहीं किया। लेकिन डिलीवरी के वक़्त जब मैंने अपना वज़न नापा, तो वो गुड न्यूज़ वाले दिन से 24 किलो बढ़ चुका था, अब मैं 84 किलो की एक माँ बन चुकी थी.

 

बच्चा होने के बाद वज़न बढ़ना मेरी एहमियत नहीं रही. मेरे लिए उस वक़्त मेरी बेटी पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी था. उसकी परवरिश में मैं कब एक साइज़ से दूसरे में चली गयी, पता नहीं चला. अब ये वज़न मुझे शारीरिक और मानसिक प्रोब्लम्स में ढंग से दिखने लगा था. इससे निपटने का टाइम अभी था या कभी नहीं था.

 

सच का सामना

मैंने कभी नहीं सोचा था कि वज़न इस कदर बढ़ेगा। वैसे मुझे ज़्यादा याद नहीं कि मेरे दिमाग़ में वज़न कम करने का ख्याल आया कब, शायद मेरी अंतरात्मा ने मुझे आवाज़ दी थी. दूसरा कारण मेरी बेटी थी, जो इतनी एक्टिव थी कि उसके साथ भागने-दौड़ने में मेरा 84 प्लस किलो वज़न अक्षम था. शायद उसी वक़्त मेरे दिमाग़ ने ये आवाज़ दी और मैंने 5 किलोमीटर की मैराथन के लिए फॉर्म भर दिया।

 

अर्श से फर्श पर

मैंने वज़न कम करने की कई कहानियाँ सुनी थी कि किसी ने कैसे एक महीने में 5 किलो कम कर लिया। ऐसे लोगों का लाइफस्टाइल ज़्यादातर ठीक नहीं रहता पर मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं था. मैं आराम से नहीं बैठी थी. हालानकी जब मैंने 5 किलोमीटर मैराथन का आईडिया घर में सुनाया, तो इस पर सवालिया निशाँ लगा दिया मेरे पति और घरवालों ने. वो इसलिए क्योंकि ये करने के लिए मैं मेडिकली फ़िट नहीं थी. मैं उन लोगों में से थी, जो एक किलोमीटर चलने के लिए कई ब्रेक लिया करते हैं. लेकिन एक बार जो मैं कमिटमेंट कर चुकी थी, फिर मैंने सच में अपने माँ-बाप की नहीं सुनी।

 

ये आसान नहीं था. मैराथन होने में अभी 3 महीने बाकी थे और मुझे शुरू से शुरुआत करनी थी. मैंने बेबी स्टेप्स से शुरुआत की, सच में!

 

नए स्पोर्टवियर और रनिंग शूज़ में मैं अच्छा फ़ील कर रही थी और धीरे-धीरे लम्बी वॉक शुरू हुई. साथ में शुरुआत हुई हेल्दी खाने की. इस सेल्फ़ ट्रेनिंग में मैं एक भी बार नहीं दौड़ी, बस तेज़ चल रही थी. नतीजा था मेरा घटा हुआ वज़न. किलो से मेरा वज़न इंच में कम होने लगा और उसके बाद मैंने इस पर ध्यान देना ही बंद कर दिया। मेरा धेय मैराथन फिनिश करना था, मैं उस रेस में आखरी नहीं आना चाहती थी, न ही उसे अधूरा छोड़ना चाहती थी. 3 महीने की मेहनत के बाद, मैं आराम से 3-4 किलोमीटर चलने लगी, बिना थके.

 

न झुकी, न रुकी

ये मेरी पहली मैराथन थी. मैने ये 5 किलोमीटर 50 मिनट में बिना रुके तय किये। न किसी एम्बुलेंस की ज़रूरत पड़ी, न ही मैं उस रेस में आखरी थी. ये बस शुरुआत थी. मेरी पहली बैंगलोर 5k मैराथन के बाद सिलसिला चल पड़ा. 2014 में हाई इंटेंस ट्रेनिंग की मदद से मैं एक 5k रन, 'Skyscraper Run', जिसमें 32 फ्लोर और 830 सीढ़ियां मैं 12 मिनट में चढ़ गयी. इस साल की शुरुआत मैंने 5k Obstacle Run से की है.

 

इसकी शुरुआत वज़न कम करने की जद्दोजहद से हुई थी, जो आखिर में हो भी गया. फ़िट होने की इस पूरी यात्रा में मैने पाया कि वज़न कम करना आसान है, उससे बड़ा गोल फिट रहना है. इसके असली मायने मैंने जाने।

 

फ़िट रहने की कोशिश में आपको ढेर  सारी शुभकामनाएं और हाँ, ख़ुद पर और अपनी बॉडी पर पूरा भरोसा रखें।

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