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गर्भधारण करने से पहले हीमोफीलिया का निदान कराना क्यों है जरूरी?

गर्भधारण करने से पहले हीमोफीलिया का निदान कराना क्यों है जरूरी?

14 Apr 2022 | 1 min Read

Ankita Mishra

Author | 406 Articles

गर्भवती महिलाओं में प्रसव के बाद गंभीर रक्तस्राव की समस्या भी देखी जा सकती है। जिसे मेडिकल टर्म में हीमोफिलिया कहा जाता है। खासतौर पर नार्मल डिलीवरी के दौरान हीमोफिलिया की समस्या अधिकतर देखी जा सकती है। ऐसे में प्रसव के बाद हीमोफीलिया बीमारी से बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए व किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, इसकी जानकारी होनी जरूरी है। 

इसी की जानकारी के लिए यहां पढ़ें हीमोफीलिया बीमारी क्या है,हीमोफीलिया के कारण, लक्षण के साथ ही इसके निदान व उपचार की जानकारी भी।

हीमोफीलिया बीमारी क्या है?

हीमोफीलिया
हीमोफीलिया / चित्र स्रोतः फ्रीपिक

हीमोफीलिया एक आनुवांशिक बीमारी (Hemophilia in Hindi) है, जिसे गंभीर रक्तस्राव विकार कहा जाता है। यह एक आनुवांशिक बीमारी है। यानी अगर किसी परिवार में हीमोफीलिया बीमारी का इतिहास है, तो यह उनके बच्चों में भी हो सकता है। यही कारण है कि अगर किसी महिला को प्रसव के बाद हीमोफीलिया यानी गंभीर रक्तस्राव की समस्या होती है, तो यह उसे उसके परिवास से मिली विरासत बीमारी के कारण हो सकता है। 

इसके अलावा, ऐसी महिलाओं या लोगों में छोटी-मोटी चोट, सर्जरी या त्वचा के कटने-छिलने पर भी गंभीर रक्तस्राव हो सकता है और उनके चोट से खून सामान्य से अधिक बह सकता है। 

दरअसल, शरीर में रक्त के थक्के बनाने में एक खास तरह के प्रोटीन की भूमिका होती है। वहीं, अगर शरीर में उस प्रोटीन का निर्माण न हो या उसका उत्पादन प्रभावित हो जाए, तो ऐसी स्थिति में रक्त के थक्के बनने कम हो सकते हैं और हीमोफीलिया हो सकता है। 

हीमोफीलिया के प्रकार

हीमोफिलिया के प्रकार विभिन्न हो सकते हैं, जिनमें से इसके दो प्रकार सबसे मुख्य व आम माने जाते हैंः

  1. हीमोफीलिया ए (क्लासिक हीमोफीलिया) – यह क्लॉटिंग फैक्टर VIII की कमी के कारण हो सकता है।
  2. हीमोफिलिया बी (क्रिसमस डिजीज) – यह क्लॉटिंग फैक्टर IX की कमी के कारण हो सकता है।

गर्भावस्था में प्रसव के बाद हीमोफीलिया का प्रभाव

अगर किसी महिला को जन्म से ही हीमोफीलिया बीमारी है या गर्भावस्था के दौरान उसे हीमोफीलिया होता है, तो इसके कारण प्रसव के दौरान उसके शरीर से अधिक मात्रा में रक्तस्राव हो सकता है। अत्यधिक रक्तस्राव की समस्या नॉर्मल डिलीवरी व सी-सेक्शन दोनों ही तरह के प्रसव में हो सकती है। 

इसके अलावा, प्रसव के बाद हीमोफीलिया होने से नई माँ में निम्नलिखित समस्याएं हो सकती हैं, जैसेः

  • महिला को एनिमिया यानी शरीर में खून की कमी होना
  • आयरन की कमी होना
  • प्रसव के बाद लंबे समय तक शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है
  • प्रसव के बाद हीमोफीलिया की वजह से कमजोरी हो सकती है
  • प्रसव के दौरान अत्यधिक खून बहने से महिला बेहोश हो सकती है

हीमोफीलिया के कारण

हीमोफीलिया के कारण (Causes Of Hemophilia In Hindi) निम्नलिखित हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैंः

  • आनुवांशिक बीमारी के कारण
  • जीन में उत्परिवर्तन या परिवर्तन के कारण। ऐसा गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के निर्माण में क्रोमोसाम के बंटवारे के दौरान हो सकता है। यह खासतौर पर पिता की तरफ से बच्चों को अधिक मिल सकता है। इस वजह से इसे पैतृक रक्तस्राव भी कहा जाता है।
  • दुर्लभ मामलों में, यह बदलती लाइफस्टाइल के कारण मध्यम आयु वर्ग से लेकर, बुजुर्ग लोगों व युवा महिलाओं में भी हो सकता है। 
  • गर्भवती होने पर

हीमोफीलिया के लक्षण

सामान्य से अत्यधिक रक्तस्राव होना ही हीमोफीलिया के लक्षण का पहला संकेत माना जाता है। इसके अलावा भी  हीमोफीलिया के लक्षण निम्नलिखित होते हैं, जैसेः

हीमोफीलिया
हीमोफीलिया / चित्र स्रोतः फ्रीपिक
  • शरीर के अंदर रक्तस्राव होना
  • मुंह, मसूड़ों से रक्तस्राव होना। 
  • इंजेक्शन लगाने के बाद खून का न रूकना
  • जोड़ों में ब्‍लीडिंग होने उनमें दर्द व सूजन की समस्या हो सकती है
  • मल या मूत्र में खून आना
  • बिना किसी चोट के कारण नाक से खून आना
  • उल्टी में खून आना
  • वहीं, मस्तिष्क में रक्तस्राव होने के कारण हमेशा सिरदर्द, मतली, उल्टी या दौरे जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।
  • नार्मल डिलीवरी के दौरान शिशु के सिर से खून बहना

हीमोफीलिया का निदान

हीमोफीलिया का निदान (Diagnosis Of Hemophilia In Hindi) करने के लिए स्वास्थ्य चिकित्सक निम्नलिखित विधियों को अपना सकते हैंः

  • परिवार में हीमोफिलिया है या नहीं, इसका इतिहास जानना। अगर परिवार में पहले से ही हीमोफिलिया मौजूद है, तो वे जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशु में जीन परिवर्तन हुआ है या नहीं, इसकी पुष्टि करने के लिए उचित टेस्ट कर सकते हैं।
  • लक्षणों के आधार पर व्यक्ति में हीमोफिलिया का निदान करना।
  • रक्त परीक्षण करना। इस दौरान में रक्त के थक्के बनाने वाले प्रोटीन की गणना कर सकते हैं।

हीमोफीलिया का इलाज

हीमोफीलिया का इलाज करने के लिए निम्नलिखित उपचार मौजूद हैंः

  • ब्लड फैक्टर में बदलाव – यानी रक्त के थक्के जमने वाले कारक को बदला जा सकता है। इससे रक्त के थक्के बनाने वाले प्रोटीन के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है। इस प्रक्रिया को इन्फ्यूजिंग कहा जाता है। इसमें नस के जरिए शरीर में ब्लड फैक्टर में बदलाव किया जा सकता है।
  • हीमोफिलिया उपचार केंद्र (HTC) – यह एक तरह का क्लीनिक होता है, जहां डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्य पेशेवर की टीम हीमोफिलिया के मरीजों का उनके लक्षणों और कारणों के आधार पर उचित इलाज करते हैं।
  • इनहिबिटर्स – इनहिबिटर्स यानी एंटीबॉडीज के जरिए भी खून के थक्के बानने की प्रक्रिया को बढ़ाया जा सकता है। हाालंकि, इस उपचार को लंबे समय तक के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता है। ऐसे में डॉक्टर दुर्लभ मामलों में ही इनहिबिटर्स से हीमोफिलिया का इलाज करने की सलाह दे सकते हैं।

नोटः गर्भावस्था के दौरान हीमोफीलिया का इलाज करने के लिए डॉक्टर किस प्रकार के उपचार की सलाह देंगे, यह गर्भवती महिला के स्वास्थ्य, उसके लक्षणों और गर्भावस्था के चरण पर आधारित हो सकता है। इसलिए, बेहतर होगा कि गर्भधारण करने से पहले ही हीमोफीलिया का निदान कराएं और उसका उचित इलाज कराएं।

गर्भावस्था में हीमोफीलिया होने पर इन बातों का रखें ध्यान 

अगर गर्भवती महिला को पहले से ही हीमोफीलिया है या उसे गर्भावस्था के दौरान हीमोफीलिया होता है, उसे निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए, जिससे वह अपने साथ ही अपने शिशु की सेहत को भी बेहतर बनाए रख सकती है।

  • हीमोफीलिया के इतिहास के बारे में डॉक्टर को बताएं। 
  • डॉक्टर की सलाह के अनुसार आर एच फैक्टर की जांच कराएं।
  • प्रसव के बाद शिशु के जन्म के बाद उसका आर एच फैक्टर चेक करवाएं।
  • गर्भावस्था के दौरान खानपान का विशेष ध्यान रखें।
  • शिशु के जन्म के बाद आहार में आयरन युक्त खाद्यों का सेवन करें।

इन बातों के साथ ही, अगर गर्भवती महिला को छोटी-मोटी चोट लगने के बाद लंबे समय तक खून बहता है या बिना किसी चोट के नाक से खून बहता है, तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और तुरंत प्रभाव से इसका उपचार कराना चाहिए।

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