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आज अचानक मन मे ये ख्याल आया है।

क्यो; न हम सब दोबारा से बच्चे बन जाय।।

बच्चे बनकर दोबारा से वो अपना बचपन जी के आएं।

बचपन मे जो खेल खेले,वो दोबारा खेल के आये।।

एक बार फिर उन खिलौनों को देख के आये।

एक बार फिर अपनी उस गुड़िया को दुल्हन बनाके आये।

फिर से उस पार्क में झूल कर आये।

और उसी स्कूल के क्लास की बेंच पर बैठ कर आये।।

आज फिर दोबारा उन्ही दोस्तो से मिल कर आये।

आज वो मन का बोझ सारा उतार कर आये।।

जो मन में है बात वो सारी कहकर आये।

क्यो न हम सब दोबारा से बच्चे बन जाये।।

आज फिर मम्मी पापा से जिद कर आये।

वो परियों के देश की सारी कहानी सुन आये।।

फिर से माँ की गोदी में सर रखकर सोएं।

फिर मनपसंद के माँ से पकवान बनवाये।।

क्यों न हम दोबारा से बच्चे बन जाये।

एक बार; फिर वो अपना बचपन जी के आये।।


Sahi Kha Aapne.. we miss childhood day's..

Bilkul sahi kaha...
School life to kabhi nahi bhul sakti

पढ़ के बहुत अच्छा लगा क्या समय था ओ भी बचपन की लाइफ बादशाह की जीतें थे दोस्तों क्या बताऊं बचपन बात ही अलग है क्या कहानी पोस्ट की आप ने

bhot hi sundar poem hai.... kya ye aapne likha hai dear?

Beautiful lines


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