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नन्हीं जान के साथ फुर्सत के वह चार पल

रिजल्ट वाले दिन दिल की धड़कने तो मेरी शुरु से ही तेज हो जाती थी लेकिन उस दिन के रिलज्ट ने तो जैसे सांसे ही रोक दी। खुशी में रोना क्या होता है मैंने उसी दिन जाना। वह डर था, रोमांच था या खुशी थी पता नहीं। पर वह अहसास बेहद खास था। आज भी मुझे याद है जब उस रिजल्ट को देख कर मेरे शरीर के रोएं खड़े हो गए थे। वह रिजल्ट था मेरी प्रेगनेंसी का। शादी के दो साल बाद मुझे इस खुशी का पहला फरमान मिला था।

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अगले साढ़े आठ महीने मेरे लिए किसी रोलर कोस्टर राइड से कम नहीं थे। पर इससे भी कठिन था वह दिन जब मैं डिलीवरी के लिए घर से निकली। आज भी मैं जब उस दिन को सोचती हूं तो सहम जाती हूं। दो बार दर्द का इंजेक्शन लगाने के बाद भी जब मुझे लेबर पेन नही हुआ तो वह फैसला लिया गया जिसे मैं कभी नहीं चाहती थी। फैसला था सी सेक्शन डिलीवरी का। ऑपरेशन से बच्चा पाने में लोग सोचते हैं कि लेबर पेन का अहसास ना होता हो लेकिन यकीन मानिए यह आम डिलीवरी से बेहद मुश्किल होता है।

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पेट पर सुन्न करने वाले इंजेक्शन के लगाने के बाद मुझे बड़ा डर लग रहा था पर कुछ ही देर में मैंने अपनी बेटी को डॉक्टर की हाथों में देखा तो बहुत खुश हो गई। चाहती थी कि उसे हाथ में ले लूं लेकिन यह कोशिश करना भी मुमकिन नहीं था। उस समय ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरा पेट मेरे शरीर के साथ जुड़ा ही नहीं है।

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करीब आधे घंटे बाद वह मेरी बेटी को मेरे पास लेकर आई। नन्हें हाथ, नन्ही ऊंगलियां और वह रोने की कोशिश कितना सुहाना पल था मेरे लिए। उस वक्त के अहसास को मैं कैसे बयान करूं। रोना भी चाह रही थी और हंसना भी, खुशी भी थी तो चिल्लाना भी चाहती थी। यह सब इमोशन जैसे आंसूओं का रूप धारण कर मेरी आंखों के नीर से बह निकले थे। फिर एक और टाइम था मेरा घबराने का। वजह थी मेरा दूध ना आना। कहीं पढ़ा था मैंने कि सी सेक्शन डिलीवरी के बाद अक्सर दूध आने में दिक्कत होती है लेकिन यह सच बनकर मेरे ही सामने आ जाएगा पता नहीं। कितनी रोई थी मेरी नन्ही परी उस समय। उसका रोना देख मेरी आंखों से भी झरने बह निकले।

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फिर नर्स आई, मेरी ब्रेस्ट को उसने इस कदर दबाया कि कुछ समय के लिए मुझे लेबर पेन जैसा ही दर्द होने लगा। फिर कहीं पंद्रह मिनट की जहदोजहद के बाद मुझे पहला दूध आया। दूध मिलते ही मेरी बेटी ऐसी चुप होई जैसे मानों उसे बस इसी का इंतजार था। शुरुआती चार दिनों में अपनी बच्ची को फीड कराना मेरे लिए किसी युद्ध लड़ने से कम नहीं था। जब भी कोई मेरे पास नहीं होता था तो मैं भगवान से यही दुआ मांगती थी कि मेरी बेटी अभी ना रोए क्योंकि उसे गोदी में लेकर फीड कराना मेरे लिए मुमकिन था नहीं और पेट में लगे टांकों के कारण मूव करना भी आसान नहीं था।

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इन सबके बीच प्रसव की अगली सुबह का दर्द बयां करना भी जरूरी हैं। रात को इतनी गहरी नींद आई कि सुबह उठते ही मैं भूल गई थी कि पेट पर टांके लगे हुए हैं। मैं वॉशरूम जाने के लिए उठने की कोशिश ही कर रही थी कि मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने पेट को चीर दिया है। उस एक सेकेंड में मेरी आंखे बुरी तरह खुल गई, दिमाग में मानों बत्ती सी जल गई। पास सोई मेरी सास भी एकदम से चौंककर मेरे पास आई और एक प्यारी सी झाड लगाई। उन्होंने मुझे सहारा देकर वॉशरूम तक पहुंचाया।

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अस्पताल में बिताए चार दिन मेरे लिए चार साल से कम नहीं थे। हर वक्त एक ही सवाल मेरे जहन में रहता था कि यहां से निकलने के बाद मैं अपनी परी का ख्याल कैसे रखूंगी। उसकी इतनी कोमल त्वचा, नाजुक शरीर और नन्हीं जान का मैं आखिर अकेले कैसे ख्याल रखूंगी। जब घर आएं तो पहली बार मैं अपनी बेटी के साथ फुर्सत के चार पल बिताएं। आज भी याद हैं मुझे वह दोपहर का समय जब मैं और मेरी बेटी पलंग पर लेटे थे और मेरी बातों को वह ऐसे टकटकी लगाकर सुन रही थी जैसे सब समझ रही हो।

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अब बारी थी मेरा दिमाग बुरी तरह से दौड़ाने की। घर आने के बाद मुझे मेरी बेटी को नहलाने और इसकी मालिश करने से मुश्किल कोई काम नहीं लगा। फिर मैंने नेट और अपने आसपास मौजूद माओं के अनुभव से अपनी बेटी के सामान खरीदें। बच्चे के लिए क्रीम, साबुन तो मैंने चुन लिया था लेकिन अब बारी थी उसे नहलाने की। जिसे मैं अभी सही से गोदी में लेकर दूध भी नहीं पिला सकती थी उसे बाथटब में नहलाना मेरे लिए डराने जैसा लग रहा था। फिर वहां काम आया मेरी सासू मां का अनुभव। मेरी सासू मां तो मेरी बेटी को ऐसे नहला रही थी जैसे उनके लिए यह कोई आम काम हो। फिर मेरी सास ने मुझे बताया वह ब्रह्म ज्ञान जिससे वह यह कर पाई। “डर पर काबू” जी हां यही वह चीज है जिससे छोटे बच्चों को संभालना सबसे आसान हो जाता है।

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नहलाने के बाद उसकी मालिश भी कम चुनौती भरा काम नहीं था। नन्हें और पतले-पतले हाथ-पांव की मालिश कैसे करूं यह समझ पाना मेरी तो समझ से परे था। यहां भी मेरी सास ने मेरा रोल प्ले किया। खुद आगे आकर उन्होंने लगभग एक महीने तक तो खुद मेरी बेटी की मालिश की और उसके बाद एक दो महीने तक हर बार मालिश के समय मेरे साथ रही और समझाती रहीं कि कहां गलती हो रही है और कहां नहीं।

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अच्छा इन सबके बीच एक मेन चीज तो मैं बताना ही भूल गई। डायपर चेंज करना और कपड़े पहनाना, शुरुआती दिनों के कठिन कार्यों में से सबसे अहम है। जन्म के दूसरे दिन मेरी बेटी ने बिलकुल काली पॉटी की जिसे देख में अंदर से परेशान हो गई। फिर डॉक्टर ने बताया कि यह तो आम है। इस दौरान अपनी बेटी का डायपर चेंज करना मेरे लिए वाकई मुश्किल कार्य था। दूसरा मुश्किल काम था उसे ड्रेस करना।

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अब आते हैं कुछ पॉजीटिव साइड पर। ऊपर लिखी सारी परेशानी, रातों को जागना, रोना, दर्द, झुंझलाहट सब… सब माने सब उन पलों में फुर्र हो जाता है जब मेरी बेटी स्माइल करती हैं। उसकी मलमल से भी मुलायम हाथों का स्पर्श जब मेरे हाथ पर लगता है तो मैं अपने सारे दर्द भूल जाती थी। रात को चाहे वह कितना भी परेशान करें पर जब वह सोती थी तो उसके चेहरे पर वह सुकून देखना किसी खजाने के मिलने की खुशी से कम नहीं था।

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मां बनने का अहसास शायद खुद इसे महसूस किए बिना व्यक्त करना मुश्किल है। इस सफर में तमाम उतार-चढ़ाव हैं। जागती रातें हैं, दर्द भरे दिन है तो वहीं मुस्कराती सुबह और अलसाई शामें भी हैं। मां बनने के शुरुआती दिनों में मैं तो दिन और रात के फर्क को भी भूल गई थी। इस सफर में कई साथी बनते हैं, कई रिश्ते बनते हैं, कई रिश्तों का महत्व समझ आता है। आज मैं मां बनकर यह महसूस कर सकती हूं कि मेरी मां ने मुझे पालने में कितने जतन किए होंगे। ना जानें कितनी रातें जागी होंगी वह मेरे लिए, फिर भी एक समय हम गुस्से या आवेग में कह बैठते हैं कि आपने हमारे लिए किया क्या है। बड़ा अनोखा है मां बनने का अहसास।;


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Thanks for sharing dear....

Thanks for sharing

बहुत अच्छा

Bahut pyara post h apka...Roop ji

Ati sunder

Bahut accha post he

बहुत प्यारी पोस्ट..

Thnks sharing

Cried a lot while reading this. Bche ki ek muskan hmare sare dard aur parshaniyan bhula deti hain Bilkul sahi kaha. 😊

आज मैं बहुत खुश हूं,आज मैं अपने पेट पर जितनी बार भी हल्की थपकी दी मेरा बेबी भी मुझे उतनी ही बार किक किया , वैसे तो रोज ही किक करता है

very true......bda pyara ehsaas hota है

Nice dear..


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