माँ से अलग होते ही बच्चा रोने लगे तो ये एंग्जायटी की निशानी होती है. इससे ऐसे निपटें

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माँ से अलग होते ही बच्चा रोने लगे तो ये एंग्जायटी की निशानी होती है. इससे ऐसे निपटें

बच्चे और माँ का रिश्ता अटूट माना जाता है. उसे हर जगह माँ चाहिए होती है, शायद यही वजह से कि उससे बिछड़ने पर उससे थोड़ी देर अलग होने पर भी उस पर इसका प्रभाव पड़ता है.

 

चलिए बात करते हैं Separation Anxiety के बारे में

 

Separation Anxiety यानि बच्चे का माँ से बिछड़ना। ये कुछ पलों का भी हो सकता है, जैसे जब माँ की गोदी से नन्हा बच्चा किसी और के पास जाता है. जब तक वो लोगों को पहचानता नहीं है, वो उनके पास जाते ही रोने लगता है. ये तो हुई तब की बात जब बच्चा काफ़ी छोटा होता है और सिर्फ़ रो कर ही अपन परेशानी बता सकता है.

 

माँ से अलग होने की चिंता या घबराहट बच्चों में 3-4 की उम्र में भी होती है. मैंने अपने बेटे को कुछ दिनों के लिए अपने माँ-बाप के पास भेजा था. मेरे लिए ये थोड़ा मुश्किल था, क्योंकि मैंने इतने दिनों के लिए कभी उसे खुदसे अलग नहीं किया था. बेटा भी नाना-नानी के साथ जाना चाहता था इसलिए मैंने सबकी बात मान कर उसे भेज दिया। कुछ ही दिनों में कॉल आया कि उसने पहले दिन लेकर अभी तक पॉटी नहीं की है. बहुत लोग इसे Separation Anxiety नहीं मानेंगे, लेकिन ये उसी के लक्षण थे. बाकि बच्चों की तरह न तो वो शाम को मेरे लिए रोता था, न ही खाना खाने से मना करता था, ख़ुश भी रहता था, लेकिन वो मुझे मिस कर रहा था. उसका शरीर ये समझ नहीं पा रहा था और इसी वजह से उसके पेट में गड़बड़ हो रही थी. सलाह लेने के लिए मैंने अपने डॉक्टर को कॉल किया तो उन्होंने कुछ सुझाव दिए. मैंने उससे फ़ोन पर बात की और कहा कि मैं कल उसे लेने आऊँगी और उसके लिए आइस क्रीम भी लेकर आऊँगी। बस उसका पेट खुल गया.

 

इस घटना के बाद मुझे बिछड़ने पर होने वाली एंग्जायटी के बारे में क्या पता चला   

 

इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि आपका बच्चा आपके बिना रह सकता है या नहीं। जैसे ही उसे कुछ चीज़ों की आदत हो जाती है, उनका न होना उसे खलता है. आप उसे छोड़ कर अगर ऑफिस जाती हैं, तो उसे पता है कि आप वापस आएंगी। ऐसा लगातार होने पर वो इसकी आदत डाल लेता है लेकिन आपसे ज़्यादा समय की दूरी को समझ नहीं पाएगा और परेशान होने लगेगा। ऐसी घबराहट से बचने का कोई ख़ास तरीका नहीं है, लेकिन आप उसे इसके लिए बेहतर तैयार कर सकती हैं.

 

बचपन 8 से 9 माह का बच्चा ये समझने लगता है कि उसके माँ-बाप उसके बिना कहीं जाते हैं. एक बार उसे एहसास हो जाये कि वो उसे अकेला नहीं छोड़ रहे तो वो इसकी आदत डाल लेगा। किसी पार्टी में या ऑफ़िस जाते वक़्त उसे सच बताएँ कि आप कहाँ जा रही हैं. ये उसकी समझ के लिए बेहतर होगा।

 

उसे अपने से अलग रहने के लिए ऐसे तैयार करें

उसे अपने किसी मित्र, माता-पिता या नैनी के पास छोड़ने की थोड़ी आदत डालें। इससे वो आपके अलावा भी बाकी लोगों को पहचान पाएगा और उसका उनसे रिश्ता बनने पर उसे इतना अजीब नहीं लगेगा।

 

बच्चों में एंग्जायटी कम करने पर सलाह:

 

कहीं जा रही हैं, तो उसे जल्दी बाय बोलें। देर तक उसके पास खड़े न रहें, इससे बच्चा शक करने लगता है.

 

अगर वो रो रहा है, तो रुके नहीं। हाँ उसके चुप करवा कर या ये कह कर कि आप वापस आएँगी, बाहर जाएँ। उसे एक बार पता चल जाएगा कि आप उसके रोने पर बाहर नहीं जाती हैं, तो ये उसकी आदत बन जाएगी और आपके लिए मुसीबत।

 

चोरी-छुपे न जाएँ बिना बाय बोले जाने से बच्चे को धोखा सा महसूस होता है. ये आपके लिए आसान होग लेकिन वो इस भाव को नहीं समझ पाएगा। आप आसानी के लिए बाय बोलते समय घर के किसी बड़े को बोल कर उसका ध्यान इधर-उधर कर सकती हैं.

 

थोड़ा बड़ा होने पर वो एंग्जायटी दूर करने के तरीके:

जाते हुए उसे ढंग से बाय कहें, उसे किस करें या गले लगें। ताकि आपके वापस आने तक वो ठीक रहे.

 

जाते हुए उसे कुछ काम देते जाएँ। पौधों में पानी डालना, कपड़े संभालना या नहाना। काम उसके हिसाब से कैसा भी हो सकता है ताकि उसका ध्यान लगा रहे. वापस आने पर उसे शाबाशी देते हुए काम अच्छे से करने के लिए कुछ ट्रीट दे सकती हैं.

 

वापस आने का सही टाइम बताएँ ये इसलिए ज़रूरी है क्योंकि आपके जाने पर वो आपका इंतज़ार करने लगेगा। उसे सही टाइम बता कर आप उसे शांत रख सकती हैं.

 

प्रीस्कूल की उम्र में स्कूल का पहला दिन यानी ढेर सारा ड्रामा। भले की ये बच्चे की ज़िन्दगी की नई शुरुआत है, लेकिन आपको ये ध्यान देना होगा कि वो वहाँ भी आपके अलावा किसी और पर ट्रस्ट नहीं करेगा। ट्रस्ट करने में भी उसे टाइम लगेगा। उसके लिए ये जगह बिलकुल नई होगी।

 

उसकी एंग्जायटी दूर करने के तरीके उसे बताएँ कि बात करना बहुत सही चीज़ है, वो टेंशन में होगा, लेकिन उसे ये बताना भी ज़रूरी है कि वो इसे हैंडल कर सकता है.

 

एंग्जायटी के लक्षणों के लिए तैयार रहें। बिस्तर गीला करना, हकलाना, स्कूल न जाना इसके शुरूआती लक्षण हैं. इन पर ध्यान दें. उससे बात करें और उसका मन हल्का करने का प्रयास करें।  

 

उसका रूटीन न चेंज करें। जब आप उसके रूटीन में कोई बदलाव नहीं लेकर आएंगी, तो उसे भी लगेगा कि स्कूल जाना उसकी लाइफ़ का हिस्सा है और वो धीरे-दिए नॉर्मल होने लगेगा।

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