…वो अजनबी जो आ गया मेरे करीब

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…वो अजनबी जो आ गया मेरे करीब

मैं लड़कों से दूर भागती थी, कोई लड़का मेरी नज़रों को जंचता ही नहीं था। फिर एक दिन मुझे वो मिला, जो मेरे लिए एकदम अजनबी था। … मगर उसने मुझ पर जाने कैसा जादू डाला कि मैं उसे अपने करीब आने से रोक न सकी। आज मैं सोचती हूं कि कैसे वो अजनबी मेरा बन गया?


इस साल मेरी शादी को चार साल हो जाएंगे यानी पूरे 48 महीने...! इस बारे में सोचती हूं तो आश्चर्य होता है  कि कैसे एक पराया घर मेरा अपना घर बन गया, कैसे कोई दूसरा परिवार मेरा अपना परिवार बन गया और कैसे एक अजनबी मेरा ख़ास, मेरा हमदम बन गया...!


चलिए मैं आपको फ़्लैशबैक में चार साल पहले ले चलती हूं। हां, ऐसी ही मई की चिलचिलाती धूप थी, तपती गर्मियां थीं। मुझे गर्मियां बिलकुल पसंद नहीं। और ऐसी उमस भरी गर्मी में हैवी मेकअप-जूलरी और लहंगा पहन कर किसी शादी में जाने का मतलब मेरी जान निकलना। एक रिश्तेदार के यहां शादी थी। मेरे मम्मी-पापा तो शादी का हर फंक्शन अटेन्ड कर रहे थे मेरा छोटा भाई भी उनके साथ रोज़ ही चला जाता था। मैं पढ़ाई का बहाना करके टाल देती थी। इस शादी के लिए मेरे चाचा-चाची खास करके रोहतक (हरियाणा) से आए हुए थे।


शादी वाले दिन तो मुझे भी जाना पड़ा। शादी एक रिसॉर्ट में थी इसलिए हम सुबह ही वहां पहुंच गए। एक रूम मिलते ही मम्मी ने मुझे आराम करने के लिए कहा। बस फिर क्या था मैं तो मजे से सो गई। शाम को मम्मी ने मुझे स्पेशली ब्यूटीशियन से तैयार करवाया। मम्मी के इस व्यवहार से तो मैं बहुत खुश हो रही थी। नीचे रिसेप्शन एरिया में भी मम्मी मेरा पूरा ध्यान रख रही थीं। सभी रिश्तेदार एक-दूसरे से मिल रहे थे। ... पर जाने क्यों लग रहा था कि लोग मुझे कुछ ज्यादा ही अटेंशन दे रहे थे। पता नहीं किसी मौसी जी की ननद जी की बुआ जी की नानी-दादी... पता नहीं कौन-कौन.... उफ्फ!!! सारे लोग आ-आकर मुझसे ही मिल रहे थे।


सामने स्टेज पर दूल्हा-दुल्हन थे तो नीचे जैसे मैं उनको कॉम्पटीशन दे रही थी। हद तो तब हो गई कि जब एक ही परिवार के कई लोग मुझसे आकर मिल रहे थे। मैं देख रही थी कि एक लड़का भी मुझे बार-बार नोटिस कर रहा था। ...खैर रिसेप्शन और शादी भी निपट गई। दूसरे दिन सब अपने-अपने घर को रवाना।


घर लौटते ही मैंने सबके चेहरे खिले देखे। रोहतक वाली चाचीजी तो बहुत ही खुश थीं। दादा-दादी, बुआ आदि सब खुश थे। शाम तक मौसी भी अपने परिवार के साथ हाज़िर थीं। फिर बुआ और मौसी ने मुझे धीरे-धीरे बताना शुरू किया कि कल शादी में गाज़ियाबाद वाले फूफाजी के बेटे को सबने मेरे लिए पसंद कर लिया है। मैं हक्की-बक्की रह गई थी। अब मेरे दिमाग की घंटी बजी कि कल मुझे स्पेशल ट्रीटमेंट इसीलिए दिया जा रहा था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे रिएक्ट करूं। मैंने बहुत सारे किंतु-परंतु दिए, उनके पास मेरे हर सवाल का जवाब था। मुझे कल की शादी की फोटो भी दिखाई जिसमें वो महाशय भी थे। हुम्म्.... मैंने सोचा- लड़का तो हैंडसम एंड स्मार्ट दिख रहा है। कल वो मुझे कई बार अपने आस-पास भी दिखा था। मैं उससे इंप्रेस भी हुई थी पर उस समय मैंने ऐसे किसी ख़याल को अपने मन में आने नहीं दिया था।


... पर इस समय उसके बारे में जानकर मुझे अच्छा लग रहा था। कल जो मुझे अजनबी लग रहा था आज जैसे  मेरे दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हो। मैं नर्वस हो गई।


.... और फिर सबने तय किया कि क्यों न कल इन दोनों को शादी वाले रिसॉर्ट में ही मिलवाया जाए। ये आइडिया सबको पसंद आया। फोन पर उन लोगों की भी राय ली गई।


.... तो अगले दिन मैं उस ‘अजनबी’ से मिली और मुझे पता चला कि उस अजनबी का नाम अनिकेत है। और कुछ महीनों बाद वो अजनबी मेरा लाइफ पार्टनर बन गया।
आज सोचती हूं तो ये सब किसी सपने जैसा लगता है। हमारी शादी भी उसी रिसॉर्ट में हुई और सुहागरात भी उसी रिसॉर्ट में। वो पहला मौका था जब हम दोनों बिल्कुल अकेले थे। वरना जब भी हम मिलते कोई-न-कोई हमारे साथ होता।


... उस रात हनीमून सुइट में केवल हम दोनों थे और हमारे बीच थे ढेर सारे रोमांटिक लम्हे। सबकुछ वैसा ही जैसा फिल्मों में होता है। सबकुछ था .... मगर हम संभोग नहीं कर पाए... पता नहीं क्या बात थी कि हम सक्सेस नहीं हो पाए... खैर हमने एक-दूसरे को खूब प्यार किया... और बातों-ही-बातों में सुबह हो गई। हमारी आंख लगी ही थी कि वेटर मॉर्निंग टी ले आया।


और वो हमारी ज़िंदगी की नई सुबह थी। 10 बजे तक घरवाले हमें लेने आ गए थे। ससुराल पहुंचकर मैं नई दुनिया में खो गई थी। शादी की गहमा-गहमी में कुछ दिन बीत गए। हनीमून के लिए दार्जिलिंग पहुंचकर ही हमें दुबारा करीब आने का मौका मिला। इस बार सुहागरात वाला अधूरा प्यार पूरा हुआ। उसके बाद तो हर रात मेरे पति मुझे नया सरप्राइज़ देते। हमारे इंटीमेसी के, लवमेकिंग के... संभोग के लम्हे को वे इतना ख़ास बना देते कि मैं आनंद से भर उठती थी।
घर के काम-काज, लोगों की मौज़ूदगी में कई बार मैं संभोग के लिए सहज नहीं हो पाती तो वे मुझ पर दबाव नहीं डालते मगर थोड़ी देर बाद वे मेरे बेहद करीब होते।


दो साल बाद मेरी गोद में एक प्यारी-सी बेटी आ गई। इस दौरान अनिकेत मेरा पूरा ध्यान रखते। जाने कैसे उन्होंने अपने अरमानों पर काबू रखना सीख लिया था। मैं उन्हें छेड़ती तो किसी टीनेजर की तरह शरमा जाते। डिलीवरी के दो महीने तक तो अनिकेत ने बड़ा संयम दिखाया मगर उसके बाद अनिकेत को रोकना मुश्किल था। अनिकेत जितने प्यारे पति हैं उतने ही ज़िम्मेदार पापा भी। बेटी जब तक सो नहीं जाती, तब तक अनिकेत ‘हम इंतज़ार करेंगे कयामत तक... ‘ वाले मोड में रहते हैं। और मैं भी उन्हें ज्यादा इंतज़ार नहीं करवाती हूं क्योंकि किसी भी पति-पत्नी के लिए संभोग ही वह माध्यम है जिसके द्वारा वे एक-दूसरे के बेहद करीब होते हैं। संभोग ही उनके रिश्ते को मज़बूत बनाता है।


... तो अब शाम गहराने लगी है, वो प्यारा-सा अजनबी यानी मेरे पति कमरे में मेरा इंतज़ार कर रहे हैं और पति को यूं इंतज़ार कराना ठीक नहीं। चलती हूं, फिर मिलेंगे... बाय, गुड नाइट!

 

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