मुज़फ्फरपुर के बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रही है कच्ची लीची

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मुज़फ्फरपुर के बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रही है कच्ची लीची

 

वर्ष 1995 से अब तक भारत के मुजफ्फरपुर (बिहार) में हर साल एक अनजान तीव्र न्यूरोलॉजिकल बीमारी (acute toxic encephalopathy) के प्रकोप से जिसमें बच्चों को बुखार हो जाता है जिसे चमकी बुखार भी कहते हैं। इस बीमारी से सैकड़ों बच्चो की मौत लगातार हो रही है | भारत के शोधकर्ताओं के एक ग्रुप ने हाल ही में अपने गहन अध्ययन पर आधारित एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका ‘ द लांसेट’ ने प्रकाशित किया है|

 

इस अध्ययन के अनुसार भारत के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (National Centre for Disease Control -NCDC) एवं अमेरिका के यू एस सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ( US Centers for Disease Control and Prevention) के वैज्ञानिको ने मिल कर पाया कि मुजफ्फरपुर में बच्चो की इन मौतों का कारण ‘लीची’ है | लीची में प्राक्रतिक तौर पर एक विषाक्त पदार्थ हाइपोग्लाइसीन ए (hypoglycin A) एवं मेथिलिनसायक्लो प्रोपाइल ग्लाइसिन  (methylenecyclopropylglycine) होता है। जो बच्चों में शर्करा के स्तर को कम कर देता है (hypoglycaemia and metabolic derangement) जिसके कारण ही ये बच्चे तीव्र न्यूरोलॉजिकल बीमारी (acute toxic encephalopathy) से ग्रसित होकर मर जाते हैं |

 

'विज्ञान' पत्रिका में डॉ. सुनील वर्मा का एक लेख https://vigyaan.org/popular/303/ में आप पढ़ सकते हैं। जिसमें उन्होंने लिखा है कि भारत के ही अन्य वैज्ञानिक समूह ने अपने इस अध्ययन को मई 2014 में भारत से प्रकाशित होने वाली वैज्ञानिक पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित भी किया है | डॉ वर्मा को जीव जंतुओं की पहचान की तकनीक 'यूनिवर्सल प्राइमर टेक्नोलॉजी' (US पेटेंट 7141364 एवं 11 अन्य पेटेंट) के जनक के रूप में जाना जाता है।

 

डॉ. सुनील वर्मा ने लिखा है कि विज्ञान की मानें तो मुजफ्फरपुर  बिहार में रहस्मयी बुखार के प्रकोप को कम करने के लिए अगर सभी बच्चों को खूब ग्लूकोज़ / गन्ने का रस, गुड़, शुद्ध शहद इत्यादि घोल-घोल कर खिलाया-पिलाया और चटाया जाए तो उनकी इस बीमारी की रोकथाम तीव्रता से हो सकती है और सैकड़ों जानें बच सकती हैं। शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों के अलावा स्वस्थ बच्चों को भी एहतियात के तौर पर ग्लूकोज़ घोल कर पिलाएं और शहद चटाएं।और हां, लीची को फल की तरह खायें, दाल रोटी की तरह ठूंस-ठूंस कर नहीं। कच्ची लीची और उसके बीज बच्चों को बिल्कुल न खाने दें। पकी हुई लीची में यह रसायन नहीं होता। पकी हुई लीची को बदनाम न करें।

 

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