मां के समान कोई गुरु नहीं

हिंदू पंचाग के अनुसार आषाढ़ मास की शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है।
इस बार 16 जुलाई को गुरु पूर्णिमा और चंद्र ग्रहण साथ-साथ पड़ रहे हैं इसलिए गुरु पूर्णिमा शाम को 4:30 बजे तक ही मनाई जाएगी।


आषाढ़ मास की पूर्णिमा महर्षि वेद व्यास की जयंती है। उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। अतः इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना पूरी की थी। तब देवताओं ने उनकी पूजा की थी। इसलिए तबसे इस दिन गुरु पूर्णिमा मनाई जाने लगी है। गुरु पूर्णिमा को गुरु का पूजन किया जाता है।


‘गुरु’ दो शब्दों से बना है। ‘गु’ का अर्थ है- अंधकार या अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ है- निरोधक, यानी जो ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान को मिटा दे वह गुरु है। इस तरह जो हमें ज्ञान दे, शिक्षा दे, हमारा मार्गदर्शन करे, जीवन को नयी दिशा दे, हमें उन्नति के पथ पर ले जाए- वही गुरु है।


आज के दिन को हम जिस महर्षि वेद व्यास की जयंती के रूप में गुरु पूर्णिमा मनाते हैं उन्होंने ही कहा है कि माता के समान कोई गुरु नहीं है- नास्ति मातृसमो गुरुः। वे कहते हैं कि गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं, शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।


बच्चे की प्रथम गुरु मां होती है। एक मां गर्भ से ही अपने बच्चे को अच्छे संस्कार देती है और अपने जीवन पर्यंत तक अपने बच्चे को जीवन की सीख देती रहती है। मां हमेशा बच्चे का कल्याण चाहती है। वह चाहती है कि उसका बच्चा सदा प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे और जीवन में खुश रहे। बच्चे के लिए मां अपने प्राण भी त्याग देती है। इसलिए कहते हैं कि मातृ ऋण से कभी उऋण नहीं हुआ जा सकता है। तभी कहते हैं- मातृ देवो भवः।
हम सभी का जीवन गुरु के बिना अर्थहीन है। बच्चे के प्रथम गुरु उसके माता-पिता होते हैं। माता-पिता ही बच्चे को प्राथमिक शिक्षा और जीवन के संस्कार देते हैं। माता-पिता ही बच्चे के व्यक्तित्व को गढ़ते हैं और उसे पूरा करने का कार्य गुरु करते हैं। गुरु हमें जीवन के मार्ग पर आगे ले जाते हैं। अपने ज्ञान से हमें जीवन में सफलता की ओर ले जाते हैं। जीवन में उन्नति करने, समाज-परिवार-देश की सेवा करने लायक गुरु ही बनाते हैं। आध्यात्म के पथ पर गुरु ही आगे ले जाते हैं। ईश्वर का साक्षात्कार गुरु ही करवाते हैं इसलिए संत कबीरदास कहते हैं -


गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।

 

हर धर्म में गुरुओं की महिमा गाई गई है। सिख धर्म में गुरुओं का भगवान का दर्ज़ा दिया गया है। सिख धर्म का पूजा स्थल ही गुरुद्वारा होता है, वे ईश्वर के अलावा अपने दसों गुरुओं की वाणी को ही अपना आदर्श मानते हैं, गुरु ग्रंथ साहिब की पूजा करते हैं और उसके बताए रास्ते पर चलते हैं। दूसरे धर्मों के लोग भी अपने गुरुओं को भगवान का दर्जा देते हैं और उनका सम्मान करते हैं।


साथ ही बौद्ध धर्म और जैन धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। आषाढ़ माह के शुक्ल पूर्णिमा के दिन ही महात्मा बुद्ध ने वर्तमान में वाराणसी के सारनाथ में पांच भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश दिया था। यही वह दिन था, जब महात्मा बुद्ध ने गुरु बनकर अपने ज्ञान से संसार प्रकाशित किया। इसलिए बौद्ध धर्म में गुरु पूर्णिमा का पर्व इतने धूम-धाम तथा उत्साह के साथ मनाया जाता है।


जैन धर्म में गुरु पूर्णिमा को लेकर यह मत प्रचलित है कि इसी दिन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने गांधार राज्य के गौतम स्वामी को अपना प्रथम शिष्य बनाया था। जिससे वह ‘त्रिनोक गुहा’ के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिसका अर्थ होता है प्रथम गुरु। यही कारण है कि जैन धर्म में इस दिन को त्रिनोक गुहा पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।


मुस्लिम धर्म में भी उलेमाओं को दूसरे शब्दों में गुरु कहा जाता है। ईसाई धर्म में पादरी को धर्म गुरु कहते हैं। उन्हें सम्मान से फादर कहा जाता है।
आज का दिन अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञ भाव को दर्शाने का दिन है। गुरु का जितना भी धन्यवाद किया जाए , कम ही है क्योंकि गुरु के गुणों का हम बखान नहीं कर सकते हैं। संत कबीर दास ने लिखा है कि पूरी पृथ्वी को कागज बना कर, सभी जंगल को कलम बना कर, सातों समुद्र की स्याही बना कर भी गुरु के गुण लिखे नहीं जा सकते हैं-


सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय |
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय ||

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