तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई: सुषमा स्वराज

देश की कद्दावर नेता, प्रखर वक्ता, करोड़ों लोगों की प्रेरणा स्रोत और भारतीय राजनीति की सशक्त नेत्री सुषमा स्वराज का पार्थिव शरीर पंचत्तव में विलीन हो चुका है। भारत सरकार ने उनके सम्मान में दो दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। 

 

6 अगस्त की देर रात को पूर्व विदेशमंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के आकस्मिक और असामयिक निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके सुषमा स्वराज को इन शब्दों में श्रद्धांजलि दी, ''भारतीय राजनीति का एक महान अध्याय ख़त्म हो गया है। भारत अपने एक असाधारण नेता के निधन का शोक मना रहा है, जिन्होंने लोगों की सेवा और गरीबों की ज़िंदगी बेहतर के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। सुषमा स्वराज जी अनूठी थीं, जो करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत थीं। सुषमा जी अद्भुत वक्ता और बेहतरीन सांसद थीं। उन्हें सभी पार्टियों से सम्मान मिला। बीजेपी की विचारधारा और हित के मामले में वो कभी समझौता नहीं करती थीं। बीजेपी के विकास में उन्होंने बड़ा योगदान दिया।''


6 अगस्त को सुषमा स्वराज ने भी पूरे देश के साथ जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और 35ए हटाने के बाद खुशी मनाई थी। उन्होंने नरेंद्र मोदी को धन्यवाद कहने के लिए अपने ट्वीट में कहा था, ''प्रधानमंत्री जी, आपका हार्दिक अभिनंदन। मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।''

 


पर देश को क्या पता कि काल भी हमारी इस विदुषी और जनप्रिय नेता की प्रतीक्षा कर रहा था। देर रात गए अचानक खबर आई कि कार्डिएक अरेस्ट के कारण सुषमा जी को एम्स में भर्ती करवाया गया है। देश उनके सेहतमंद होने की दुआ कर रहा था मगर लोगों की दुआ कुबूल नहीं हुई और देश ने मां समान अपनी प्रिय नेता को खो दिया।


भारतीय राजनीति में आने के बाद से अपनी मृत्यु तक सुषमा जी सक्रिय रहीं। उन्होंने हमेशा ही जनता की जरूरतों का ध्यान दिया। 2014 में मोदी मंत्रिमंडल में भारत की पहली पूर्णकालिक विदेश मंत्री बनने के बाद सुषमा जी ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। कहते हैं उस समय सुषमा जी लोगों से केवल एक ट्वीट की दूरी पर थीं। ऐसे कितने किस्से उनके कार्यकाल में सोशल मीडिया पर घूमते रहते थे कि किसी की एक पुकार पर सुषमा जी का मंत्रालय उसकी मदद के लिए पहुंच जाता था। उन्होंने विदेशों में मुश्किल में फंसी कितनी औरतों और आदमियों की मदद की। सुषमा जी की पहल पर पाकिस्तान के कितने ही मरीजों का इलाज भारत में हो पाया। सुषमा जी ने पाकिस्तान में फंसे कितने ही लोगों की वतन वापसी कराई।


आज पूरा देश अपनी इस नेता के अंतिम सफर पर निकल जाने से दुखी है। सुषमा जी ने बीमारी का हवाला देते हुए जब 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया तो उनके पति और पूर्व राज्यपाल स्वराज कौशल ने उनके फैसले का स्वागत करते हुए यह ट्वीट किया था। अपने चिर परिचित सेंस ऑफ़ ह्यूमर का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने लिखा कि अब उनके पीछे दौड़ने के लिए वो इतने जवान नहीं रहे।


स्वराज कौशल ने लिखा था, "मैडम, अब चुनाव न लड़ने के फैसले के लिए बहुत शुक्रिया। मुझे याद है कि एक समय मिल्खा सिंह ने भी दौड़ना बंद कर दिया था। यह मैराथन 1977 से- 41 साल से चल रही है, आप 11 बार सीधे चुनाव लड़ चुकी हैं। बल्कि 1977 के बाद से आपने सारे चुनाव लड़े हैं, सिर्फ़ दो बार को छोड़कर जब 1991 और 2004 में पार्टी को आपने चुनाव नहीं लड़ने दिया था। आप चार बार लोकसभा, तीन बार राज्यसभा और तीन बार विधानसभा में चुनी गईं। आप 25 साल की उम्र से चुनाव लड़ रही हैं। मैडम मैं बीते 46 साल से आपके पीछे दौड़ रहा हूं। अब मैं 19 साल का लड़का नहीं रहा। प्लीज़, मेरी सांस भी अब फूलने लगती है। शुक्रिया।"


… और स्वराज कौशल सच में पीछे रह गए पत्नी सुषमा स्वराज इतनी दूर निकल गईं कि अब उनको दौड़ कर पकड़ना किसी के बस का नहीं। बीजेपी दफ़्तर में रखे गए सुषमा स्वराज के शव को राजकीय सम्मान के साथ जब सलामी दी गई तो बेटी बंसुरी के साथ स्वराज कौशल रो पड़े।


रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल ने लॉ की पढ़ाई साथ-साथ की थी। 14 फ़रवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला कैंट में जन्मी सुषमा स्वराज ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1970 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की थी। क़ानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1973 में सुषमा और स्वराज कौशल ने साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस शुरू कर दी और जुलाई 1975 में दोनों परिणय-सूत्र में बंध गए। दोनों ने साथ-साथ राजनीतिक यात्रा भी शुरू की। स्वराज कौशल 34 वर्ष की आयु में ही देश के सबसे युवा महाधिवक्ता और 37 साल की उम्र में देश के सबसे युवा राज्यपाल बने। वह 1990-93 के बीच मिज़ोरम के राज्यपाल बनाए गए।


1977 के लोकसभा चुनावों के दैरान जेल में बंद जॉर्ज फर्नांडिस के प्रचार की कमान सुषमा स्वराज ने संभाली थी। और जॉर्ज फर्नांडिस विजयी हुए। आपातकाल के दौरान सुषमा ने जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। आपातकाल के बाद वह जनता पार्टी की सदस्य बन गईं।


इसके बाद 1977 में पहली बार सुषमा ने हरियाणा विधानसभा का चुनाव जीता और महज़ 25 वर्ष की आयु में चौधरी देवी लाल सरकार में राज्य की श्रम मंत्री बन कर सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनने की उपलब्धि हासिल की। 80 के दशक में भारतीय जनता पार्टी के गठन पर सुषमा बीजेपी में शामिल हो गईं। अंबाला से दोबारा विधायक चुनने पर बीजेपी-लोकदल सरकार में शिक्षा मंत्री बनाई गईं। 1990 में उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया गया। 1996 के लोकसभा चुनाव में भी वे जीती थीं। वे 12 अक्टूबर 1998 में दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।


सुषमा जी का राजनीतिक कद उस समय सबसे ऊंचा उठ गया जब 1999 में कर्नाटक के बेल्लारी से कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में उतरीं लेकिन हारने पर भी वे हारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष की जीत है। जब सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाना तय था तब वे आक्रमण की मुद्रा में आ गईं। उन्होंने गर्जना की कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वे सिर मुंड़वा लेंगीं, सफेद वस्त्र धारण करेंगी और जमीन पर सोएंगी। सुषमा जी की यह चेतावनी रंग लाई और सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से अपने कदम पीछे खींच लिए। इस तरह भारतीय राजनीति में सुषमा जी का व्यक्तित्व दिनोंदिन ऊंचा उठता गया।
सुषमा जी भारतीय संस्कृति, भारतीय अस्मिता और भारतीय नारी की पहचान थीं। इस ओजस्वी वक्ता और प्रखर व्यक्तित्व का लोहा पूरी दुनिया ने माना जब 29 सितंबर 2018 को संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने शेरनी की तरह भाषण दिया था और वह भी हिंदी भाषा में।


सात बार सांसद और तीन बार विधायक रह चुकीं सुषमा स्वराज दिल्ली की पांचवीं मुख्यमंत्री, 15वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, संसदीय कार्य मंत्री, केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री और विदेश मंत्री रह चुकी हैं। वह भारतीय संसद की ऐसी अकेली महिला नेता हैं जिन्हें असाधारण सांसद चुना गया। वह किसी भी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता भी थीं।
इस तरह हम कह सकते हैं कि सुषमा जी ने भारतीय राजनीति की गरिमा बढ़ाई, संसद में स्त्रियों की अस्मिता को नई पहचान दी। मंगलवार, 6 अगस्त 2019 को उनके देहांत के साथ ही भारतीय राजनीति का एक गौरवशाली अध्याय समाप्त हो गया।


बेबीचक्रा भारतीय राजनीति के इस देदीप्यमान नक्षत्र को अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है!!!

 

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