शिशु के मस्तिष्क के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व

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शिशु के मस्तिष्क के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व

गर्भावस्था की दूसरी तिमाही वह समय होता है जब होने वाली माँ गर्भवती दिखाई देने लगती है यानी उसका पेट निकल आता है। इसी अवधि में शिशु का तेजी से विकास होता है जिसे अब भ्रूण कहा जाता है। गर्भावस्था के ये तीन महीने मॉर्निंग सिकनेस और पहली तिमाही में होने वाली थकान से राहत दिलाने वाले होते हैं। यह गर्भावस्था का बहुत ही सुनहरा दौर होता है जिसमें माँ बनने वाली स्त्री खुद को ज्यादा ऊर्जावान और स्वस्थ महसूस करती है।

 

दूसरी तिमाही में शिशु के मस्तिष्क और हड्डी का ज्यादा-से-ज्यादा विकास होता है। इस तीन महीने की अवधि में शिशु के फेफड़े, ह्रदय और रक्त कोशिका प्रणालियों का उचित विकास उस स्तर तक होता है कि भ्रूण 24 सप्ताह के बाद माँ के शरीर से बाहर रहने में सक्षम हो जाता है। होनेवाली माँ को शिशु और खुद के विकास और स्वास्थ्य के लिए अपने भोजन में आवश्यक पोषक तत्व जरूर शामिल करने चाहिए।

 

गर्भवती महिला जो खाना खाती है वही उसके शिशु के पोषण का जरिया होता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि पोषक तत्वों से भरपूर और संतुलित भोजन खाया जाए। दूसरी तिमाही की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए मदर्स हॉर्लिक्स बहुत ही उपयोगी सप्लीमेंट है जिसमें 25 महत्वपूर्ण पोषक तत्व और विटामिन ए-ई जैसे पोषक तत्वों के 50% आरडीए हैं।

 

यहां महत्वपूर्ण 5 पोषक तत्वों की सूची दी गई है जिन्हें गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में अपने भोजन में जरूर शामिल करना चाहिए।

डीएचए

दूसरी तिमाही में शिशु के मस्तिष्क का विकास अपने चरम पर होता है इसलिए उचित मात्रा में डीएचए लेना इस विकास में सहायक होता है। जिससे आगे चलकर बच्चों में बेहतर व्यवहार, ध्यान केन्द्रित करने और सीखने की क्षमता को सुनिश्चित करता है। डीएचए के सेवन से शिशुओं में एलर्जी का खतरा कम होता है और इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान माँ में डीएचए की कमी हो जाती है क्योंकि यह थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भ्रूण के विकास में खर्च होने लगता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हर तिमाही में आवश्यकतानुसार इसके खुराक की मात्रा बढ़ाई जाए। डीएचए मस्तिष्क और रेटिना का एक महत्वपूर्ण अंग है। गर्भवती महिला द्वारा उचित मात्रा में डीएचए का सेवन उसके लिए एक स्वस्थ और पूर्ण गर्भावस्था को सुनिश्चित करता है।

रोजाना 300 मिलीग्राम की खुराक लेनी चाहिए।

 

कैल्शियम

कैल्शियम हमारे शरीर में नहीं बनता है इसलिए हमें इसे भोजन या सप्लीमेंट्स के रूप में लेना पड़ता है। दूसरी तिमाही में शिशु की हड्डी का विकास अपने चरम पर होता है। इसलिए की कैल्शियम की जरूरत को पूरा करने के लिए गर्भवती को भोजन या सप्लीमेंट के रूप में कैल्शियम की खुराक लेनी चाहिए। यदि गर्भवती स्त्री उपयुक्त मात्रा में कैल्शियम का सेवन नहीं करती तो शिशु कैल्शियम की अपनी खुराक मां के शरीर से खींचता है जिसके कारण माँ को लंबे समय तक इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। कैल्शियम गर्भवती के शरीर में तरल पदार्थ को सुचारू करता है साथ ही शिशु की हड्डियों और दांतों की जड़ों के निर्माण में सहायक होता है।

रोजाना 1000 मिलीग्राम की खुराक लेनी चाहिए।

 

प्रोटीन्स

दूसरी तिमाही में शरीर अधिक प्रोटीन की मांग करता है क्योंकि शिशु तेजी से बढ़ना शुरू कर देता है। प्रोटीन मस्तिष्क के साथ भ्रूण के ऊतकों के विकास को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। यह गर्भावस्था के दौरान माँ के स्तनों और गर्भाशय के ऊतकों को बढ़ने में मदद करता है और भ्रूण को रक्त की आपूर्ति बढ़ाने में सहायक होता है। प्रोटीन शिशु के प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए एंटीबॉडी बनाने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

रोजाना 70 ग्राम की खुराक लेनी चाहिए।

 

विटामिन डी

विटामिन डी को सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है। यह कैल्शियम को सोखने के लिए जरूरी होता है। इसलिए विटामिन डी कमी से शिशु को दोनों ही प्रयाप्त मात्रा में नहीं मिल पाते हैं। बढ़ते हुए शिशु में विटामिन डी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है इसके कारण शिशु में हड्डियों का उचित विकास होता है जो कि दूसरी तिमाही में शिशु के विकास के लिए अति महत्वपूर्ण है।

रोजाना 10 मिलीग्राम की खुराक लेनी चाहिए।

 

 

मैग्नीशियम

दूसरी तिमाही के समय माँ बनने वाली स्त्री के शरीर में काफी अधिक बदलाव आते हैं। बढ़ते वजन के कारण पैरों की मांसपेशियों में ऐंठन होने की बहुत संभावना होती है। मैग्नीशियम इस ऐंठन को कम करने में काफी सहायक होता है और शिशु की हड्डियों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गर्भावस्था के दौरान हॉर्मोनल बदलावों के कारण मैग्नीशियम की काफी मात्रा पेशाब के जरिए निकल जाती है। इसके अलावा, मैग्नीशियम भ्रूण की कोशिका विभाजन और वृद्धि में भी एक महत्वपूर्ण  भूमिका निभाता है।

रोजाना 310 मिलीग्राम की खुराक लेनी चाहिए।

 

संतुलित और पौष्टिक आहार के अलावा माँ बनने वाली महिला को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वह भरपूर पानी और अन्य तरल पदार्थों का भी सेवन करे जिससे शरीर में पानी की कमी न हो। दूसरी तिमाही में शिशु के उचित विकास के लिए माँ बनने वाली महिला को अपने भोजन में रोजाना 340 कैलोरी लेनी चाहिए। माँ बनने वाली स्त्री को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे दो लोगों का भोजन खाना है क्योंकि ऐसा करने से माँ का जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ जाता जोकि शिशु और माँ दोनों के विकास के लिए नुकसानदेह है। इसलिए माँ बनने वाली महिला को हमेशा पौष्टिक आहार ही लेना चाहिए। 

अस्वीकरण: भोजन में पोषक तत्वों और उसकी खुराक लेने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

इस लेख में सभी विचार केवल लेखक के हैं और यह जानकारी के रूप में व्यक्त किए गए हैं।

 

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