जानें क्यों अशुभ माना जाता है होलाष्टक

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जानें क्यों अशुभ माना जाता है होलाष्टक

हमारे देश में कई त्योहार मनाए जाते हैं। हर त्योहार को मनाने के धार्मिक कारण होते हैं, उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं, भोगोलिक और वैज्ञानिक कारण भी होते हैं। त्योहार खुशियां ले आते हैं, लोगों में उमंग भरते हैं और त्योहारों के साथ नए और शुभ कार्यों की शुरुआत भी होती है। परंतु त्योहारों से कुछ अशुभ मान्यताएं भी जुड़ी होती हैं।

ऐसे ही होली रंगों का त्योहार है मगर इसके पहले के आठ दिन अशुभ माने गए हैं जिन्हें होलाष्टक कहते हैं। आइए जानते हैं कि होलाष्टक क्या होता है और इसे क्यों अशुभ मानते हैं और इस दौरान क्या काम नहीं किए जाते हैं?

होलाष्टक किसे कहते हैं?

होलाष्टक दो शब्दों के मेल से बना है- होला और अष्टक। जिसका अर्थ होता है होली के पूर्व के आठ दिन। होली के पहले के इन्हीं आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलाष्टक प्रारंभ हो जाता है। यह होली से आठ दिन पहले ही प्रारंभ हो जाता है। यह आठ दिन ही होलाष्टक के नाम से जाने जाते हैं। जो फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि  से प्रारंभ होकर होकर फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन के साथ ही समाप्त होता है।

होलाष्टक क्यों होता है अशुभ?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक के समय कुछ ग्रह उग्र अवस्था में आ जाते हैं और उन ग्रहों के उग्र अवस्था में होने के कारण ही कोई शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। फाल्गुन मास अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य,दशमी को शनि,एकादशी को शुक्र, द्वादशी को बृहस्पति, त्रयोदशी को बुध और चतुर्दशी को मंगल अपनी उग्र अवस्था में आ जाते हैं। इसके साथ ही पूर्णिमा के दिन राहु अपनी उग्र अवस्था में होता है।
इस वजह से इन आठों दिन मानव मस्तिष्क तमाम विकारों, शंकाओं और दुविधाओं आदि से घिरा रहता है, जिसकी वजह से शुरू किए गए कार्य के बनने के बजाय बिगड़ने की संभावना ज्यादा रहती है। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को इन आठों ग्रहों की नकारात्मक शक्तियों के कमजोर होने की खुशी में लोग अबीर-गुलाल आदि छिड़ककर खुशियां मनाते हैं। जिसे होली कहते हैं।

होलाष्टक की कथा

प्रेम के देवता काम देव ने महादेव के ऊपर प्रेम का बाण चलाकर भगवान शिव की तपस्या को भंग किया था और इसी से क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र को खोलकर इसी फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन भस्म कर दिया था।
दूसरी कथा के अनुसार यह माना जाता है कि अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानने लगा था। अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को स्वयं की यानी हिरण्ययकश्यप की पूजा करने का आदेश देता था। मगर भक्त प्रह्लाद ने कभी उसकी बात नहीं मानी। तब हिरण्यकश्यप ने उसे शारीरिक यातना देना शुरु किया। हिरण्यकश्यप ने फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन ही बंदी बनाया था और प्रह्वाद को यातनाएं देने लगा था। इसलिए इन आठ दिनों को हिंदू धर्म के अनुसार सर्वाधिक अशुभ माना जाता है। इसीलिए इन आठ दिनों तक कोई भी शुभकार्य नहीं किए जाते हैं। इसी समय से होलाष्टक की शुरूआत हो गई थी।

होलाष्टक की परंपरा

जिस दिन से होलाष्टक प्रारंभ होता है, गली मोहल्लों के चौराहों पर जहां-जहां परंपरा स्वरूप होलिका दहन मनाया जाता है, उस जगह पर गंगाजल का छिड़काव कर प्रतीक स्वरूप पेड़ की दो शाखाँ काट कर उसे जमीन पर लगाते हैं। इसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांध देते हैं। इसे भक्त प्रहलाद का प्रतीक माना जाता है एवं दूसरे को होलिका का प्रतीक माना जाता है। इसके पश्चात यहां सूखी लकड़ियां और विशेषकर गाय के गोबर से निर्मित शुद्ध कंडे लगाए जाने लगते हैं। जिन्हें होली के दिन जलाया जाता है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।


होलाष्टक में न करें ये काम

धर्मशास्त्रों में वर्णित 16 संस्कार जैसे- गर्भाधान, विवाह, पुंसवन (गर्भाधान के तीसरे माह किया जाने वाला संस्कार), नामकरण, चूड़ाकरण, विद्यारंभ, गृह प्रवेश, गृह निर्माण, गृह शांति, हवन-यज्ञ कर्म आदि नहीं किए जाते। इन दिनों शुरु किए गए कार्यों से कष्ट की प्राप्ति होती है। इन दिनों हुए विवाह से रिश्तों में अस्थिरता आजीवन बनी रहती है अथवा टूट जाती है। इसके अलावा नवविवाहिताओं को इन दिनों में मायके में रहने की सलाह दी जाती है। घर में नकारात्मकता, अशांति, दुःख एवं क्लेष का वातावरण रहता है। होलाष्टक के दिनों में कोई भी नई नौकरी, नया काम, नया व्यवसाय शुरू करने से बचना चाहिए।

होलाष्टक में करें ये खास काम

- होलाष्टक के समय में मनुष्य को अधिक से अधिक भगवत भजन, जप, तप, स्वाध्याय व वैदिक अनुष्ठान करना चाहिए ताकि समस्त कष्ट, विघ्न व संतापों का क्षय हो सके।

- यदि शरीर में कोई असाध्य रोग हो जिसका उपचार के बाद भी लाभ नहीं हो रहा हो तो होलाष्टक की इस अवधि में रोगी भगवान शिव का पूजन करें। योग्य वैदिक ब्राह्मण द्वारा महामृत्युंजय मंत्र का अनुष्ठान प्रारम्भ करवाएं, बाद में गूगल से हवन करें।

- होलिका दहन के बाद होलाष्टक समाप्त हो जाता है और उस समय में शुभ और मांगलिक कार्यों की फिर से शुरूआत हो जाती है।

इस वर्ष होलाष्टक 2 मार्च से प्रारंभ हो रहा है, जो 9 मार्च यानी होलिका दहन तक रहेगा। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा ​तिथि तक होलाष्टक माना जाता है। 9 मार्च को होलिका दहन के बाद अगले दिन 10 मार्च को रंगों का त्योहार होली धूमधाम से मनाया जाएगा।

आप भी उत्साह और उमंग के साथ रंगों और मस्ती का त्योहार होली जरूर मनाएं।

बैनर छवि : sakshipost

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