• Home  /  
  • Learn  /  
  • क्या जरुरी है रिश्तेदारों की जबरदस्ती दखलअंदाजी
क्या जरुरी है रिश्तेदारों की जबरदस्ती दखलअंदाजी

क्या जरुरी है रिश्तेदारों की जबरदस्ती दखलअंदाजी

22 Dec 2021 | 1 min Read

कहते हैं कि प्रेगनेंसी वह समय होता है जब सबसे ज्यादा सलाहें मिलती है। आज की कहानी है स्नेहा की जो कि 2 महीने प्रेग्नेंट थी, उसके लिए यह समय बहुत ही खास था। हो भी क्यों ना क्योंकि मां बनना सबसे सुखद एहसास होता है। स्नेहा का दूसरा महीना था, उसी समय उसके देवर की शादी भी तय हुई। हालिकी स्नेहा ज्वाइंट फैमिली में नहीं थी, लेकिन एकल परिवार होते हुए भी उसे ज्वाइंट फैमिली की कमी महसूस नहीं होती थी। क्योंकि घर में ससुराल के अन्य रिश्तेदारों की दखलअंदाजी बहुत थी। ऐसा नहीं कि हर किसी के ससुराल वाले बुरे होते हैं। लेकिन कुछ ऐसे रिश्तेदार होते हैं जो हर घर में मिल जाते है। जिनका सिर्फ एक ही काम होता है, उन लोगों की जिंदगी में दखल देना जिनसे उनका कोई लेना देना नहीं था।

कुछ ऐसी ही स्नेहा की लाइफ में उसकी कजिन ननद थी। जिसकी दखल स्नेहा की जिंदगी में बहुत थी। स्नेहा को आज भी वह दिन याद है जब उसके देवर की सगाई थी। घर रिश्तेदारों से भरा था, स्नेहा को दूसरे महीने में मार्निंग सिकनेस की बहुत समस्या थी। लेकिन फिर भी वह घर के कामों में सबकी मदद कर रही थी। सगाई के एक दिन पहले स्नेहा की कजिन ननद भी थी, स्नेहा अपनी अलमारी में कुछ कपडे रख रही थी। तभी उसकी ननद ने टोका अरे तुम कैसे कपड़े रखती हो। इतने बेढंग तरीके से, स्नेहा को यह रोक-टोक बहुत बुरी लगी है। सगाई का दिन आ गया सब कुछ सही तरीके से निपट गया। रात में जब सारे रिश्तेदारों को विदा करने की बारी आई तब स्नेहा की कजिन ननद ने कहा कि अरे तुम तो आराम कर रही हो। चलो उठो सबकी विदाई करो। स्नेहा उस समय काफी कमजोर हो गई थी। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी लेकिन फिर भी वह उठी सबको विदाई दी सबके लिए नए कपडे मिठाई पैक की।

ऐसा नहीं था कि स्नेहा काम नहीं करना चाहती थी, लेकिन स्नेहा की ननद हर समय उसको नीचा दिखाने की कोशिश करती थी। वो भी इसलिए क्योंकि स्नेहा की ननद चाहती थी कि स्नेहा हर बात में उससे राय ले। उसके पूछे बिना कोई काम नहीं करे, स्नेहा के लिए यह सब आसान नहीं था। वह इसलिए विरोध नहीं कर पाई क्योंकि उसका पति उसका साथ नहीं देता था। चूकिं स्नेहा अपनी जगह गलत नहीं था, उसकी ननद का तो यह हाल था अगर स्नेहा को अपने मायके भी जाना होता। तो उसमें उसकी ननद की सहमति होनी चाहिए।

खैर स्नेहा आज के जमाने की मॉडर्न और पढ़ी लिखी लड़की थी। उसने अपनी ननद की बेकार की बातों का विरोध करना सीखा। उसने उस रूढ़िवादी मानसिकता का विरोध किया जिसमें यह समझा जाता है कि घर की बहू अगर काम करने और सबको खुश रखने में सफल है। तो ही वह एक परफेक्ट बहू है, एक आदर्श बहू का मतलब सिर्फ काम करना नहीं। बल्कि अपने आत्मसम्मान के लिए भी लड़ना है। किसी को खुश रखने के चक्कर में अपने आपको कभी नहीं बदलना चाहिए।

स्नेहा जैसी कई लड़कियों के साथ ऐसा होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एकदम चुप हो जाए। अगर किसी की सोच नहीं बदल सकते। तो दूसरों की सोच पर स्वंय को भी हावी नहीं होने दे।

प्रेगनेंसी तो वह समय होता है जब घर में सभी का साथ चाहिए होता है। लेकिन स्नेहा की कहानी कहीं ना कहीं यह सच्चाई बताती है कि गर्भावस्था के समय में मानसिक तौर से मजबूत होना कितना आवश्यक है। इसलिए अपनी बात को खुलकर बोले क्योंकि सवाल आपके और आपके बच्चे की हेल्थ का है।

#familyandrelationships

Home - daily HomeArtboard Community Articles Stories Shop Shop