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क्या शिशु की देखभाल सिर्फ माँ कि ज़िम्मेदारी है

क्या शिशु की देखभाल सिर्फ माँ कि ज़िम्मेदारी है

6 Apr 2022 | 1 min Read

Tinystep

Author | 2578 Articles

 

ज़माना बदल रहा है और आज के पुरुष महिलाओं के संग भागीदारी में हिस्सा ले रहे हैं । खाना पकाने से लेकर घर की साफ़-सफाई तक में मर्द हाथ बटा रहे हैं । इन परिस्थितियों में शादीशुदा महिलायें अपने करियर पर ध्यान दे सकती हैं। कुछ सालों पहले ऐसे हालात नही थे । लेकिन सोचने वाली बात ये है की क्या शिशु के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी सिर्फ माँ की ही है ?

चाहे हम कितनी भी प्रगति क्यों न कर लें पर स्त्री-पुरुष एक ही तराज़ू में नहीं तोले जा सकते हैं । और शिशु की देखभाल से सम्बंधित कुछ पहलू आज भी माँ से अधिक जोड़े जाते हैं । इसका अर्थ ये नही कि हमें पुरुषों की काबिलियत पर कोई शक है । वे भी पिता की ज़िम्मेदारी बखू कानून के तहत मैटरनिटी लीव अनिवार्य है । नवजात शिशु को हर पल अपनी माँ की देख-रेख में होना ज़रूरी होता है । इस कारण माँ को उनकी शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक देखभाल की पूर्ती करनी होती है । इन वजहों से ही नई मातायें अपनी नौकरी से कुछ दिनों का ब्रेक ले सकती हैं या फिर पूर्ण रूप से नौकरी छोड़ सकती हैं ।  

मैटरनिटी लाभ नियम 2016 के अनुसार इस बात को सुनिष्चित किया जाता है की गर्भवती महिलाओं को पूरा पैसा दिया जाये जिससे कि वे अपने शिशु की देखभाल कर सकें ।

लेकिन प्राइवेट कंपनियों में नए पिता के लिए कोई सुविधा नही मिलती इसलिए नयी माँओं को घर में बैठकर बच्चे की देखभाल करनी पड़ती है । पति भी बीवियों को यही सलाह देना पसंद करेंगे की वे घर में रुक कर बच्चे की देखभाल करें । कुछ महिलायें इस परिवर्तन को अच्छी तरह हैंडल नहीं कर पाती और सोचती हैं कि ये उनकी स्वतंत्रता और पहचान को दबा रहा है। लेकिन कुछ महिलायें मातृत्व के नए पहलू को हंसी ख़ुशी लेती हैं । घर में बैठने के कारण महिलायें ये सोचने लगती हैं की उनका प्रोफेशनल करियर थम गया है ।

डिलीवरी  के बाद अगर महिला काम करना चाहती है तो उसे क्रूर, निर्दय और स्वार्थी कहा जाता है । लेकिन  मर्द अगर काम पर जाये तो उस पर कोई रोक टोक नही लगाते । वे प्रोफेशनल तथा पिता बनने का सुख भोग सकते हैं । इस तरह से महिला के दिमाग पर प्रभाव पड़ता है । वे इस कश्मकश में डूब जाती हैं की घर और नौकरी में कैसे ताल-मेल बैठाएं । ऑफिस में उनकी उपज में भी असर  पड़ सकता है ।पुरुषों को समय का इतना ख्याल नहीं रखना पड़ता । वे किसी भी वक्त काम कर सकते हैं । औरतों को उसी जगह बेबी केयर की ज़रूरत पड़ती है । इस तरह वे मल्टी-टास्क कर सकती हैं । जिन महिलाओं के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी है वे नौकरी से ब्रेक ले सकती हैं । पर अन्य औरतें जिनकी आर्थिक हालत कुछ खास नही वे काम पे लौट जाती हैं । अन्यथा उन्हें कम बजट में घर चलाना पड़ता है ।

हम मानते हैं कि आजकल के मर्द पहले की तुलना काफी मददगार हैं परन्तु प्रकृति के संतुलन को कायम रखने के लिए दोनों  को एक दूसरे के बराबर  होना चाहिए, न कि एक दुसरे का  सेवक । टी.वी. वगैरह के ऊपर मत जाएं । कोशिश करें की शिशु को माँ-बाप दोनों का समान  प्यार मिले । समाज ये कहेगा की शिशु की देखभाल व लालन-पालन माँ की ज़िम्मेदरी है परन्तु एक पिता का भी उतना ही भाग है बच्चे के सम्पूर्ण विकास में । इसलिए इस ब्लॉग को पढ़ रहे पुरुष आगे बढ़िए और अपने बच्चे के कदम से कदम मिलाएं । हम मिल कर बदलाव लायें । औरों के साथ भी ज्ञान बाँटें और जागरूकता फैलायें ।

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