जब मैं दूसरी बार माँ बनी !

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जब मैं दूसरी बार माँ बनी !

माँ बनने की ख़ुशी क्या होती है ये एक औरत से बेहतर भला कौन जान सकता है। ऐसा ही मेरा साथ हुआ था जब पहली बार मुझे पता चला चला था की मैं माँ बनने वाली हूँ।एक दिन सुबह सोकर उठी तो याद आया की मेरी माहवारी आने में दो दिन की देरी हो गयी है। मैंने जब घर पर ही टेस्ट करके देखा ,तब उन दो गुलाबी धारियों ने मेरे दिल की धड़कन बढ़ा दी। मैं खुश भी थी और घबराई हुई भी थी।

 

मेरे पति घर पर नहीं थे , काम के सिलसिले में घर से बाहर थे। वो एक हफ्ते बाद घर लौटने वाले थे , मैं सोच रही थी क्या करूँ , कैसे करूँ ,डॉक्टर से कब जाकर मिलूं ? ये सारे सवालों ने मुझे चारों तरफ से घेर लिया था। मेरा मायका और ससुराल दोनों ही दूर थे। फिर मैंने एक लम्बी सांस भरी और दो मिनट आँख बंद करके बैठ गयी। मेरे कमरे में लगी छोटे बच्चे की तस्वीर में मुझे आने वाले बच्चे की तस्वीर दिखाई दे रही थी। थोड़ी देर बाद मैंने सबसे पहले अपने पति को फ़ोन लगाया और उनको ये खुशखबरी दी :) बाद में फ़ोन करके अपने दोस्तों और परिवार वालों को उत्साहित होकर बताया।

 

याद करती हूँ वो समय जब तीसरे महीने में मुझे लगातार चक्कर आते थे और मैं कुछ खा नहीं पाती थी , जी ख़राब रहता था सिर हमेशा भारी रहता था। कितना जल्दी घबरा जाते थे मैं और मेरे पति। हर छोटी से छोटी तकलीफ होने पर दिन हो या रात डॉक्टर के पास जाते थे। फिर डरते डरते कब समय बीता और कुछ घंटों के असहनीय दर्द को झेलने के बाद मेरा बेटा मेरी गोद में आया।

 

३ साल कैसे मेरे बेटे के पीछे दौड़ते दौड़ते बीता ,याद नहीं। बेटे को स्कूल भेज कर ,एक रोज़ मैं आराम से चाय पीते हुए अखबार पढ़ रही थी की मेरी नज़र तारीख पर गयी। बेटे की परवरिश में इतना मशरूफ रहती की दिन और तारीख का ख्याल नहीं रहता। तारीख देखी तो याद आया की मेरी माहवारी की तारीख ६ दिन पहले जा चुकी है। मैंने जल्दी से टेस्ट किया और एक बार फिर दो गुलाबी धारियों मुझे दिखाई दी। मगर इस बार मैं घबराई हुई नहीं थी , न ज़्यादा उत्साहित थी। पर हाँ मैं खुश थी , हमेशा से हम पति पत्नी यही चाहते थे की हमारे दो बच्चे हों :)

 

मगर इस बार जब पता चला तो मैंने इसे अपने तक सीमित रखा। और जब मेरा वजन बढ़ना शुरू हुआ तब बाकि लोगों को पता चला। पहली बार गर्भावस्था के दौरान , मन में बहुत से ख्याल और बेचैनी रहती थी। क्यूंकि खुद का ख्याल अब बहुत अच्छी तरह रखना था। याद करती हूँ जब मेरे पति दफ्तर के काम से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाते थे , तब अकेले खुद के लिए खाना बनाना जैसे नामुमकिन सा था। कभी दूध ब्रेड , तो कभी सैंडविच ,या नूडल्स से काम चला लिया करती थी। पर जब पता चला की अब मेरे खाने पीने का सीधा असर मेरे आने वाले बच्चे पर होगा ,फिर क्या था मैंने कमर कस ली और अपनी सेहत का ख्याल रखने का वादा खुद से किया। रोज़ खाने में सतुंलित आहार का होना , नियमित रूप से हल्का व्यायाम करना या टहलने जाने लगी।



पहली बार माँ बनने की उत्सुकता और ख़ुशी ने मेरे वो नौ महीन के सफर को बहुत आसान बनाया। मगर जब मुझे पता चला की मैं दूसरी बार माँ बनने वाली हूँ ,मेरे मन की भावनायें अलग थी, मेरा पहला बच्चा अब ३ साल का था। मेरा खाना ज़्यादातर उसका बचा हुआ खाना होने लगा था। मेरा पहला बच्चा जब गर्भ में था तब मैं थक जाने पर कभी भी आराम कर सकती थी , मगर दूसरे बच्चे के समय ये हो पाना नामुमकिन सा था। शांति से ग़ज़लें और संगीत सुनना अब मेरे ३ साल के बच्चे की कवितायेँ सुनने में बदल गया था।



ऐसा नहीं था मैं दूसरी बार माँ बनने से खुश नहीं थी। बस फर्क इतना सा था की अभी मैं गर्भवस्था से जुडी काफी परेशानियों को अच्छी से समझती थी। छोटी छोटी तकलीफ होने पर डॉक्टर के पास नहीं जाती थी। बाकी दूसरी बार माँ बनने का सुख पहली गर्भावस्था के बराबर ही था।

 

आपका क्या अनुभव रहा जब आप दूसरी बार माँ बनी ? शेयर करें आपकी कहानी।

 

बैनर छवि: policybazaar

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