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अगर गर्भावस्था में थैलेसीमिया हो जाए तो क्या करना चाहिए?

अगर गर्भावस्था में थैलेसीमिया हो जाए तो क्या करना चाहिए?

4 May 2022 | 1 min Read

Ankita Mishra

Author | 406 Articles

गर्भावस्था का सफर नाजुक माना जाता है। इस दौरान माँ के स्वास्थ्य से जुड़ी छोटी चूक भी माँ व शिशु के लिए गंभीर स्थिति बन सकती है। इन्हीं स्थितियों में से एक है गर्भावस्था में थैलेसीमिया होना। गर्भावस्था में थैलेसीमिया होना एक रक्त से जुड़ा विकार है, जो होने वाले बच्चे में आनुवांशिक बीमारी का कारण भी बन सकता है। गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया होना क्या है, इसके प्रकार व कारण आदि की जानकारी विस्तार से जानने के लिए यह लेख पढ़ें। 

गर्भावस्था में थैलेसीमिया होना क्या है? 

प्रेग्नेंसी में थैलेसीमिया होना (Thalassemia in Pregnancy in Hindi) एक आनुवांशिक यानी जेनेटिक रक्त विकार है। यानी यह माँ को उसके परिवार से मिल सकता है और गर्भावस्था के दौरान अगर उसे पहली बार थैलेसीमिया होता है, तो वह अपनी इस बीमारी को अपने बच्चे तक ट्रांसफर कर सकती है। 

थैलेसीमिया होने पर शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा असंतुलित हो सकती है। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाना वाला प्रोटीन होता है। ऐसा होने पर गर्भवती महिला के शरीर में खून की कमी हो सकती है और वह एनीमिया का शिकार भी हो सकती है। 

थैलेसीमिया के प्रकार

थैलेसीमिया के प्रकार मुख्य रूप से दो होते हैं- 

1. अल्फा थैलेसीमिया – इस स्थिति में रक्त में अल्फा ग्लोबिन प्रोटीन में परिवर्तन के कारण होता है। इसके अलावा, कुछ महिलाओं में जन्म से ही इस प्रोटीन की कमी हो सकती है।

2. बीटा थैलेसीमिया – यह रक्त में बीटा जीन न होने के कारण होता है। इसकी वजह से रक्त में बीटा ग्लोबिन प्रोटीन का उत्पादन असंतुलित हो जाता है। 

इसके अलावा, थैलेसीमिया के दोनों ही प्रकार को दो उपप्रकार भी हैं, जिनमें शामिल हैंः

i) थैलेसीमिया मेजर – अगर बच्चे को माता-पिता दोनों के ही जीन से दोषपूर्ण जीन मिलता है, तो उस स्थिति को थैलेसीमिया मेजर कहते हैं। 

ii) थैलेसीमिया माइनर – अगर बच्चे को सिर्फ माँ या पिता से ही दोषपूर्ण जीन मिलता है, तो उस स्थिति को थैलेसीमिया माइनर कहते हैं।

गर्भावस्था में थैलेसीमिया होने के कारण क्या हैं?

निम्नलिखित कारणों से गर्भावस्था में थैलेसीमिया (Pregnancy mein Thalassemia hone ke karan) हो सकता हैः

  • गर्भवती महिला को जन्म से ही थैलेसीमिया होना या उसे अपने माता-पिता से दोषपूर्ण जीन्स मिलने पर
  • गर्भावस्था या किसी अन्य स्थिति के कारण शरीर में हीमोग्लोबिन प्रोटीन जीन्स में बदलाव होना
  • मूल रूप से एशिया या अफ्रीका का निवासी होना
  • मेडिटेरियन होना
  • परिवार में थैलेसीमिया का इतिहास होना

गर्भावस्था में थैलेसीमिया का निदान कैसे किया जाता है?

निम्नलिखित तरीकों से प्रेग्नेंसी में थैलेसीमिया (Thalassemia and Pregnancy) का निदान किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैंः

गर्भावस्था में थैलेसीमिया
गर्भावस्था में थैलेसीमिया / चित्र स्रोतः फ्रीपिक
  • इलेक्ट्रोफोरेसिस टेस्ट (Electrophoresis) – यह एक रक्त परीक्षण है, जिसमें रक्त में मौजूद हीमोग्लोबिन प्रोटीन की जांच की जाती है और अल्फा और बीटा ग्लोबिन की गणना की जाती है। इस टेस्ट से यह पुष्टि होती है कि प्रेग्नेंसी में थैलेसीमिया किस रक्त प्रोटीन के कारण हुई है।
  • पेरीफेरल स्मीयर (Peripheral Smear) – इस प्रकार के रक्त परीक्षण में रक्त का आकार देखा जाता है। अगर थैलेसीमिया होता है, तो रक्त की कोशिकाएं दिखने में बैल की आंख के जैसे दिखाई देती हैं।
  • डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) एनलेसिस (Deoxyribonucleic Acid Analysis) – इस डीएनए टेस्ट से जीन्स के परिवर्तन की पहचान की जाती है।

गर्भ में पल रहे बच्चे में थैलेसीमिया का खतरा कितना है या नहीं, इसका पता कैसे लगाएं?

अगर माता या पिता में से किसी एक को भी थैलेसीमिया है, तो डॉक्टर गर्भ में पल रहे बच्चे में थैलेसीमिया का खतरा ज्ञात करने के लिए जरूरी टेस्ट की सलाह दे सकते हैं, जैसेः 

  • फीटल डीएनए एनालिसिस और जेनेटिक टेस्टिंग ऑफ एमनियोटिक – इन दोनों ही टेस्ट के लिए एमनियोटिक द्रव के नमूने की जांच की जाती है। यह एक तरह का द्रव होता है, जो गर्भनाल के अंदर भरा होता है। 

गर्भावस्था में थैलेसीमिया की पुष्टि हो, तो इससे बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ता है?

गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया होना गर्भ में पल रहे शिशु के लिए कई तरह के जोखिम उत्पन्न कर सकता है, जैसेः

  • शिशु को आनुवांशिक तौर पर थैलेसीमिया रक्त विकार मिल सकता है
  • प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु हो सकती है
  • शिशु में रक्त की कमी हो सकती है
  • शिशु का शारीरिक विकास कमजोर व धीमा हो सकता है
  • शिशु में भूख की कमी हो सकती है
  • बढ़ते विकास से साथ शिशु की हड्डियों में विकृति हो सकती है

बच्चे में थैलेसीमिया का खतरा कम से कम हो, इसके लिए गर्भवती महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान थैलेसीमिया की जांच अवश्य करानी चाहिए। अगर गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया होना जाहिर होता है, तो उचित डॉक्टरी उपचार लेना चाहिए। 

प्रेग्नेंसी में थैलेसीमिया का इलाज कैसे किया जाता है?

निम्नलिखित तरीकों से प्रेग्नेंसी में थैलेसीमिया का इलाज किया जा सकता हैः

  • खून चढ़ाना (Blood Transfusion) – अगर थैलेसीमिया की स्थिति गंभीर नहीं है, तो ब्लड ट्रांसफ्यूजन से भी इसका इलाज किया जा सकता है।
  • आयरन थेरेपी (Iron Therapy) – इससे गर्भवती महिला में एनीमिया व खून की समस्या दूर की जा सकती है। 
  • चेलेशन थेरेपी (Chelation Therapy) – अगर आयरन थेरेपी या ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दौरान आयरन की अधिकता हो जाए, तो ऐसी स्थिति में चेलेशन थेरेपी से रक्त से आयरन को बाहर निकाला जा सकता है।
  • जीन थेरेपी (Gene Therapy) – जीन थेरेपी के जरिए जीन में हुई गड़बड़ी को सुधारा जा सकता है। 
  • बोन मैरो ट्रांसप्लांट (Bone Marrow Transplant) – गंभीर स्थितियों व दुर्लभ मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी किया जा सकता है। 
  • फोलिक एसिड (Folic Acid) – अन्य इलाज की प्रक्रिया के साथ ही, फोलिक एसिड की खुराक भी दी जा सकती है।

डॉक्टर की सलाह – अगर बच्चा थैलेसीमिया के साथ जन्म लेता है, तो उसकी परवरिश व देखभाल करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? 

अगर बच्चा थैलेसीमिया के साथ जन्म लेता है, तो उसकी परवरिश व देखभाल करते समय पेरेंट्स को कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए, ताकि बच्चा भविष्य में स्वस्थ्य रूप से विकास कर सके और उसके सामान्य जीवन स्तर को बेहतर बनाया जा सके। 

गर्भावस्था में थैलेसीमिया
गर्भावस्था में थैलेसीमिया / चित्र स्रोतः फ्रीपिक

इस बारे में सलाह देते हुए मैटरनल केयर और चाइल्ड न्यूट्रिशन एक्सपर्ट डॉक्टर पूजा का कहना है कि “थैलेसीमिया के साथ जन्में अधिकांश बच्चे जन्म के दौरान स्वस्थ ही नजर आते हैं, लेकिन जन्म के पहले साल के अंदर उन्हें गंभीर एनीमिया होने का जोखिम हो सकता है। बिना इलाज के बच्चे में लीवर, हड्डियों व हृदय से जुड़ी समस्याएं हो सकती है।”

ऐसे में इन खास बच्चों की देखभाल के लिए पेरेंट्स को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिएः

  1. नियमित रूप से बच्चे के शरीर में खून चढ़वाना (Blood Transfusions), ब्लड डोनेट करने वाले व्यक्ति से बच्चे को स्वस्थ खून मिल सकता है।
  2. कुछ तरह की दवाओं की खुराक दी जाती है, यह तब आवश्यक हो सकता है, जब बच्चे के खून में आयरन की अधिकता हो जाए। इसके लिए चेलेशन थेरेपी (Chelation Therapy) दी जा सकती है। 
  3. स्टेम सेल (Stem Cell) या कॉर्ड ब्लड ट्रांसप्लांट (Cord Blood Transplant) की प्रक्रिया की जा सकती है।
  4. इसके अलावा, जीन थेरेपी समेत कुछ अन्य थेरेपी पर फिलहाल अध्ययन किए जा रहे हैं। .

अगर आपको या आपके साथी को आनुवांशिक बीमारी के तौर पर थैलेसीमिया है, तो गर्भावस्था की योजना बनाने से पहले अपने डॉक्टर की उचित सलाह ले सकती हैं। इसके अलावा, अगर गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया (Thalassaemia during Pregnancy) की पुष्टि होती है, तो इसका उचित उपचार जरूर कराएं, ताकि होने वाले बच्चे में थैलेसीमिया का खतरा कम से कम किया जा सके।

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